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यूपी का एक गांव ऐसा: बीमार खाट पर अस्पताल और दुल्हन बाइक पर पहुंचती है ससुराल; चकबंदी की आस में है तीसरी पीढ़ी
Sat, 08 Aug 2026 03:54 PM IST
Sharukh Khan
अमर उजाला नेटवर्क, गोरखपुर
अमर उजाला नेटवर्क, गोरखपुर
Published by: Sharukh Khan
Updated Sat, 08 Aug 2026 03:54 PM IST
सार
गोरखपुर में एक एक गांव ऐसा है जहां 64 साल से ग्रामीण चकबंदी के जाल में उलझे हैं। यहां दुल्हन बाइक पर ससुराल पहुंचती है। पीपीगंज के थवईपार गांव में सहूलियत कम दुश्वारियां ज्यादा हैं। तीसरी पीढ़ी चकबंदी की आस में है।
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UP Village Story
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
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विस्तार
गोरखपुर के पीपीगंज कस्बे से करीब तीन किमी दूर एक गांव है थवईपार। यहां 64 साल से चकबंदी के जाल में उलझे गांव के लोगों की जिंदगी दुश्वारियों के मकड़जाल में फंसी है। उम्मीद की आस में दो पीढि़यां गुजर गईं। गांव में छोटे-छोटे खेत कई जगहों पर हैं और रास्ता न होने से खेतों की बुवाई-कटाई भी नंबर लगाकर होती है।
अगर किसी की तबीयत खराब हो गई तो उसे खाट पर लेटाकर किसी तरह मुख्य मार्ग तक लोग लाते हैं। शादी के बाद आई दुल्हन कार से उतरकर बाइक पर सवार होकर ससुराल तक पहुंचती है। गांव में ज्यादातर शादियां अप्रैल-मई में ही होती हैं ताकि खेत कटने के बाद उस रास्ते कार में सवार होकर दुल्हन घर की देहरी तक पहुंच सके।
थवईपार गांव में करीब 150 घर हैं और आबादी करीब 1000 है। गांव की खेती करीब 250 बीघा है। गांव में ज्यादातर लोगों की आमदनी का जरिया खेती ही है। गांव के मुहाने पर एक छोटी सी जनरल स्टोर की दुकान है जहां गांव के लोग आकर बैठते हैं। थोड़ा आगे बढ़ने पर गांव के आधे हिस्से में जाने के लिए मेड़ के किनारे पतली से लीख जैसा रास्ता है। बारिश के समय पानी भर जाता है।
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अगर किसी की तबीयत खराब हो गई तो उसे खाट पर लेटाकर किसी तरह मुख्य मार्ग तक लोग लाते हैं। शादी के बाद आई दुल्हन कार से उतरकर बाइक पर सवार होकर ससुराल तक पहुंचती है। गांव में ज्यादातर शादियां अप्रैल-मई में ही होती हैं ताकि खेत कटने के बाद उस रास्ते कार में सवार होकर दुल्हन घर की देहरी तक पहुंच सके।
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थवईपार गांव में करीब 150 घर हैं और आबादी करीब 1000 है। गांव की खेती करीब 250 बीघा है। गांव में ज्यादातर लोगों की आमदनी का जरिया खेती ही है। गांव के मुहाने पर एक छोटी सी जनरल स्टोर की दुकान है जहां गांव के लोग आकर बैठते हैं। थोड़ा आगे बढ़ने पर गांव के आधे हिस्से में जाने के लिए मेड़ के किनारे पतली से लीख जैसा रास्ता है। बारिश के समय पानी भर जाता है।
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75 साल के पूर्व प्रधान राम समुझ सिंह बताते हैं, 1962 में चकबंदी की प्रक्रिया शुरू हुई थी। नापजोख के बाद बात आगे नहीं बढ़ी। अफसरों के यहां दौड़कर हम लोग थक चुके थे इसलिए पिछले लोकसभा चुनाव में मतदान न करने का फैसला लिया। विरोध पर अफसरों ने मुआयना शुरू किया और फिर चकबंदी में तेजी आई। वे कहते हैं, इससे बड़ी विडंबना क्या होगी कि घर में पहली बार आने वाली दुल्हन बाइक पर बैठकर ससुराल तक आती है।
गांव में सामाजिक ताना-बाना इतना मजबूत है कि लोग दूसरों की मुश्किलों में एक साथ खड़े नजर आते हैं। गांव के रामनवमी सिंह कहते हैं, हमारी एकता ही ताकत है। जिनके घर शादी होती है वह बगल के खेत के मालिक से बुवाई न करने का अनुरोध करता है। बदले में वह मुआवजे के तौर पर कुछ रकम भी अदा करता है। सभी लोग गांव की इज्जत को तवज्जो देते हैं और दुल्हन कार में बैठकर घर तक पहुंच पाती है।
मास्टर साहब के घर के सामने होती हैं ज्यादातर शादियों की रस्म
गांव में सेवानिवृत्त शिक्षक राम सिंह का भी घर है। उनके घर के सामने कुछ जमीन है जिस पर उन्होंने निर्माण नहीं कराया। वे कहते हैं, अगल-बगल किसी के घर तक जाने के लिए रास्ता नहीं है। इसलिए मेरे घर के सामने ही ज्यादातर लोगों के यहां की शादियों की रस्में पूरी होती हैं। कोशिश होती है कि शादियां अप्रैल से जून के बीच में हो जाएं ताकि खाली खेत से गाड़ियां दरवाजे तक आ जाए।
गांव में सेवानिवृत्त शिक्षक राम सिंह का भी घर है। उनके घर के सामने कुछ जमीन है जिस पर उन्होंने निर्माण नहीं कराया। वे कहते हैं, अगल-बगल किसी के घर तक जाने के लिए रास्ता नहीं है। इसलिए मेरे घर के सामने ही ज्यादातर लोगों के यहां की शादियों की रस्में पूरी होती हैं। कोशिश होती है कि शादियां अप्रैल से जून के बीच में हो जाएं ताकि खाली खेत से गाड़ियां दरवाजे तक आ जाए।
उम्मीद की आस में गुजर रही जिंदगी
गांव के करन कहते हैं, चकबंदी की प्रक्रिया के तहत सर्वे के बाद चक काटा जा चुका है। जोत चकबंदी आकार-पत्र 5 (सहायक चकबंदी अधिकारी द्वारा जारी किया जाने वाला नोटिस बंट गया है और फॉर्म 23 ( प्रत्येक खातेदार (किसान) को उसकी नई चकबंदी के बाद मिलने वाली जमीन का पूरा विवरण) की प्रक्रिया चल रही है। उम्मीद है कि एक साल में चकबंदी पूरी हो जाएगी। वे कहते हैं, बाबा के समय चकबंदी शुरू हुई थी और तीसरी पीढ़ी में मैं इंतजार में हूं।
गांव के करन कहते हैं, चकबंदी की प्रक्रिया के तहत सर्वे के बाद चक काटा जा चुका है। जोत चकबंदी आकार-पत्र 5 (सहायक चकबंदी अधिकारी द्वारा जारी किया जाने वाला नोटिस बंट गया है और फॉर्म 23 ( प्रत्येक खातेदार (किसान) को उसकी नई चकबंदी के बाद मिलने वाली जमीन का पूरा विवरण) की प्रक्रिया चल रही है। उम्मीद है कि एक साल में चकबंदी पूरी हो जाएगी। वे कहते हैं, बाबा के समय चकबंदी शुरू हुई थी और तीसरी पीढ़ी में मैं इंतजार में हूं।
अब नहीं होगा रास्ते को लेकर विवाद
गांव के लोगों ने रास्ते विवाद को सुलझाने का नया तरीका निकाला है। गांव में पूर्व प्रधान रामकेर सिंह कहते हैं, चकबंदी के बाद रास्ते को लेकर कोई विवाद न हो इसके लिए सभी लोगों ने तय किया है कि एक बराबर रास्ता होगा। सबने सहमति पत्र में लिखकर दिया है कि 15 कड़ी की चौड़ाई का ही रास्ता सबके घर के सामने बने। इसके लिए अधिकारी तैयार नहीं थे तो हम लोगों ने एक एकड़ पर चार की जगह पांच डिसमिल जमीन की कटौती के लिए भी अनुरोध किया है। इससे सभी के घर तक चार पहिया गाड़ी पहुंच जाएगी।
गांव के लोगों ने रास्ते विवाद को सुलझाने का नया तरीका निकाला है। गांव में पूर्व प्रधान रामकेर सिंह कहते हैं, चकबंदी के बाद रास्ते को लेकर कोई विवाद न हो इसके लिए सभी लोगों ने तय किया है कि एक बराबर रास्ता होगा। सबने सहमति पत्र में लिखकर दिया है कि 15 कड़ी की चौड़ाई का ही रास्ता सबके घर के सामने बने। इसके लिए अधिकारी तैयार नहीं थे तो हम लोगों ने एक एकड़ पर चार की जगह पांच डिसमिल जमीन की कटौती के लिए भी अनुरोध किया है। इससे सभी के घर तक चार पहिया गाड़ी पहुंच जाएगी।
चक काटकर गांव के लोगों को नोटिस दे दिया गया है। अप्रैल तक कब्जा दिलाने की कार्रवाई हो जाएगी। इसके बाद तहसील में दस्तावेज भेज दिया जाएगा। गांव में रास्ता और जलभराव की समस्या है, इसे ध्यान में रखते हुए चकबंदी की प्रक्रिया की जा रही है।-सुनील सिंह, सीओ चकबंदी