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आगरा कथा: नूरजहां चांदी से बनवाना चाहती थी पिता का स्मारक, बेबी ताज के नाम से प्रसिद्ध है ये मकबरा

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, आगरा Published by: Abhishek Saxena Updated Fri, 25 Jun 2021 02:19 PM IST
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Agra Katha: Know The History Of Itmad-ud-Daula
एत्माद्दौला स्मारक - फोटो : अमर उजाला

आगरा में यमुना नदी के बायीं ओर चीनी का रोजा के बाद है एत्माद-उद-दौला का मकबरा, जिसे मुगल बादशाह जहांगीर की बेगम नूरजहां ने अपने पिता की याद में बनवाया था। जहांगीर के शासनकाल में नूरजहां के पिता मिर्जा ग्यास बेग वजीर के पद पर थे। उन्हें एत्माद-उद-दौला की उपाधि दी गई थी। नूरजहां ने अपने पिता के मकबरे का निर्माण उनकी मृत्यु के लगभग 7 वर्ष बाद 1628 ई. में पूरा करवाया। वह इस स्मारक को चांदी से बनवाना चाहती थीं। इतिहासविद राजकिशोर राजे बताते हैं कि लेखक बाला दुबे ने अपनी पुस्तक ‘आगरा के गली-मुहल्ले’ में नूरजहां द्वारा चांदी से पिता का मकबरा बनवाने की इच्छा का जिक्र किया है। सखी सित्ती उन्निसा के समझाने पर अपना विचार बदल दिया था। चारबाग शैली में बने बागीचे के बीच में बने एत्माद-उद-दौला स्मारक सफेद संगमरमर से बना है। इसमें मिर्जा ग्यास बेग और उनकी बेगम अस्मत बेगम की कब्र है।

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एत्माद्दौला स्मारक - फोटो : अमर उजाला
इस भवन के ऊपरी चारों कोनों पर लगभग 40 फीट ऊंची चार गोल मीनारें हैं जिसके ऊपर संगमरमर की छतरियां है। इसमें  बहुरंगी अलंकरण तथा नक्काशी के साथ गुलदस्ता, गुलाब-जल के कलश, अंगूर, शराब की प्याली एवं बोतल की आकृतियों को उकेरा गया है।  
 
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अकबर का मकबरा, एत्माद्दौला स्मारक - फोटो : अमर उजाला
बेबी ताज का नाम दिया गया
यह पहला मकबरा है, जिसमें पहली बार संगमरमर में पच्चीकारी का काम किया गया है। इसको ताज के निर्माण के लिए प्रेरणास्रोत माना जाता है। इसीलिए बेबी ताज का नाम दिया गया।
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एत्माद्दौला - फोटो : अमर उजाला
मिर्जा ग्यास बेग अकबर के समय में मुगलों के दरबार में आए थे। अकबर ने उन्हें काबुल प्रांत का खजांची बनाया था। उनकी मृत्यु 1622 में कांगड़ा में हुई थी, जहां से उनके शव को आगरा लाकर दफन किया गया था।
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एत्माद्दौला क्षेत्र स्थित चौबुर्जी स्मारक - फोटो : अमर उजाला
व्यापार का प्रमुख केंद्र था आगरा
राजकिशोर राजे ने बताया कि मुगलिया दौर में आगरा व्यापार का बड़ा केंद्र रहा। अकबर के समय में देश का ही नहीं, एशिया के प्रमुख बाजार लाहौर और आगरा थे। अकबर के वजीर ए आजम रहे अबुल फजल ने भी इसका वर्णन किया है। दरी-गलीचे, शॉल, मसाले, हाथी दांत, सूती वस्त्र, लोहे के हथियार का कारोबार होता था। आगरा और सीकरी में सिक्कों की टकसालें थीं।
 
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