'लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में, तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में...'
खामोश हुई अमन की आवाज: जलते घरों के बीच भी मोहब्बत लिखते रहे बशीर बद्र, दंगों की राख से दिया इंसानियत का पैगाम
Bashir Badr Passes Away: मशहूर शायर बशीर बद्र ने दंगों में अपना घर खोने के बाद भी इंसानियत, भाईचारे और अमन का संदेश दिया। 1987 के एक साक्षात्कार में उन्होंने दंगों और मानवता पर खुलकर बात की थी।
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वर्ष 1987 में प्रकाशित एक विशेष साक्षात्कार में बशीर बद्र ने मेरठ दंगों के दर्द को साझा किया था। उन्होंने कहा था कि दंगों ने उन्हें सिर्फ माली नुकसान नहीं पहुंचाया, बल्कि उनकी शायरी को एक नया एहसास भी दिया। उन्होंने कहा था कि अब उनकी शायरी उन लोगों को समर्पित होगी, जिन्होंने दंगों के दौर में भी इंसानियत और हमदर्दी का रिश्ता निभाया।
जब पड़ोसियों ने बचाई जान
बशीर बद्र ने उस दौर को याद करते हुए बताया था कि जब उनका घर आग में जल रहा था, तब उनके हिंदू पड़ोसी मदद के लिए आगे आए। उन्होंने बताया कि पड़ोसी करन सिंह अपने घर से बार-बार पानी भरकर आग बुझाने की कोशिश कर रहे थे। जब किसी ने उनसे पूछा कि एक कलसे पानी से क्या होगा, तब उनका जवाब था -
'अगर मेरे पास दमकल होती तो आग को भड़कने का मौका ही नहीं देता।'
बशीर बद्र ने यह भी बताया कि उनके पड़ोसी हरगोपाल सिंह और धर्मपाल सिंह ने उनके परिवार की महिलाओं को अपने घर में सुरक्षित रखा और दंगाइयों से बचाया।
नफरत नहीं, भाईचारे का संदेश
बशीर बद्र का मानना था कि दंगे हमेशा खत्म हो जाते हैं, लेकिन इंसानियत और साथ रहने का रिश्ता हमेशा कायम रहता है। उन्होंने कहा था कि नफरत फैलाने वाले लोग इतिहास में कभी सम्मान नहीं पाते। उन्होंने समाज के बुद्धिजीवियों से भी अपील की थी कि वे सच और इंसानियत के पक्ष में खड़े हों, चाहे उसके लिए जोखिम ही क्यों न उठाना पड़े।
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दंगाइयों पर सख्ती की वकालत
सांप्रदायिक हिंसा पर बोलते हुए बशीर बद्र ने कहा था कि दंगा छोटा हो या बड़ा, उससे सख्ती से निपटना जरूरी है। उनका मानना था कि समाज में नफरत फैलाने वालों के खिलाफ प्रशासन को पूरी ताकत से कार्रवाई करनी चाहिए। उन्होंने साफ कहा था कि दंगाई पूरे समाज में जहर घोलते हैं और उनके साथ किसी तरह की नरमी नहीं होनी चाहिए।