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यहां स्मार्टफोन इस्तेमाल करने पर मिलती है कड़ी सजा, दारुल-उलूम देवबंद से जुड़े 8 अनजाने तथ्य

Mon, 19 Nov 2018 10:28 AM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, सहारनपुर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, सहारनपुर Updated Mon, 19 Nov 2018 10:28 AM IST
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Darul-Uloom Deoband student are not allowed to use smartphone, unknown facts
दारुल उलूम

देवबंद यूपी के सबसे महत्वपूर्ण और संवेदनशील जिलों में गिना जाता है। आबादी के लिहाज से तो यह एक छोटा शहर है लेकिन अपने आप में एक ऐतिहासिक पृष्ठभूमि रखता है। इसी शहर में स्थित है दारुल-उलूम। जी हां यह एक ऐसी जगह है जिसने देवबंद को वैश्विक पहचान दी है। आइए जानते हैं दारुल-उलूम से जुड़ी कुछ अनजानी बातें :-

Darul-Uloom Deoband student are not allowed to use smartphone, unknown facts
दारुल उलूम

दारुल-उलूम इस्लामिक शिक्षा व दर्शन के प्रचार व प्रसार के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध है। मदरसों की मां कहा जाने वाला यह मदरसा मुख्य रूप से उच्च अरबी व इस्लामिक शिक्षा का ज्ञान देने वाला विश्व का दूसरा सबसे बड़ा केंद्र है। यह साम्प्रदायिक सौहार्द, धर्मनिरपेक्षता एवं देशप्रेम का एक विशिष्ट नमूना पेश करता है।


 
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दारुल उलूम

दारुल-उलूम कितना मशहूर है। इस बात का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि देवबंद शहर को दारुल-उलूम के नाम से पहचाना जाता है। इसकी स्थापना 30 मई 1866 में हाजी आबिद हुसैन व मौलाना कासिम नानौतवी ने की थी। यहां एक लिखित परीक्षा और साक्षात्कार के बाद ही प्रवेश मिलता है।


 
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दारुल उलूम

अंग्रेजी शासन को देश से निकाल फेंकने के मकसद से दारुल-उलूम की स्थापना की गई थी। आजादी के आंदोलन में यहीं से विश्वप्रसिद्ध तहरीक-ए-रेशमी रुमाल की शुरुआत हुई थी। इस तहरीक ने अंग्रेजों के दांत खट्टे कर दिए थे। इसके तहत रेशमी रुमाल पर गुप्त संदेश लिखकर एक दूसरे को भेजे जाते थे। रेशमी रुमाल का संदेश लिखा टुकड़ा आज भी यहां सुरक्षित रखा गया है।  


 
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दारुल उलूम

यहां तालीम हासिल करने वाले विद्यार्थियों की संख्या तकरीबन साढ़े तीन हजार है। देश विदेश से भी यहां लोग शिक्षा लेने आते हैं। खास बात यह है कि यहां पढ़ने वालों को रहने खाने और पढ़ने की सभी सुविधाएं मुफ्त दी जाती हैं। आज यहां इस्लाम दर्शन, अरबी उर्दू की शिक्षा के साथ साथ हिंदी अंग्रेजी, कंप्यूटर आदि के कोर्स भी कराए जाते हैं। यहां दर्जी, किताबों पर जिल्दबंदी, किताबत यानी हस्तलेखन की कला का भी ज्ञान दिया जाता है। इसके अलावा मौलवियत की अलग अलग डिग्रियां प्रदान की जाती हैं। जिनमें मौलाना, दारुल इफ्ता प्रमुख हैं। 

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