मतगणना में हार होती देखकर भाजपा सांसद डा. यशवंत सिंह 11 बजे ही मतगणना कक्ष से बाहर आ गए। वे मतगणना देखने के बजाए अपने समर्थकों के साथ घूमते रहे। डॉ. यशवंत सिंह वैसे तो मुस्कराते घूम रहे थे, किंतु उनके चेहरे पर तनाव और चिंता साफ नजर आ रही थी। मीडिया सेंटर के सामने से वे तीन चार बार गुजरे।
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डा. यशवंत सिंह बसपा प्रत्याशी से करीब 1.70 लाख मतों से परास्त हुई। इस बड़ी हार का कारण गठबंधन तो था ही, डॉ. यशवंत सिंह का व्यवहार भी उनकी हार का कारण बना। अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने केवल पार्टी के जिलाध्यक्ष को ही महत्व दिया और आम कार्यकर्ता को नकारा। जगह- जगह उनके विरोध भी हुए। कई गांवों में इनके विरुद्ध प्रदर्शन भी हुए। आम कार्यकर्ता ने उनके कार्यकाल में खुद को उपेक्षित महसूस किया।
इनके बारे में यह भी कहा जाता है कि ये अपने पास किसी काम से आने वाले व्यक्ति से कहते थे कि ‘तुमने मुझे वोट नहीं दिया, मोदी को वोट दिया है, काम के लिए भी उसी के पास जाओ’। कार्यकर्ता इन्हें बुलाते थे किंतु इन्होंने सदा उन्हें नजर अंदाज किया। किसी ने कुछ सुझाव दिया तो उन्होंने हंसकर टाल दिया। लेकिन जनता ने भी सांसद को आइना दिखा दिया।
डॉ. यशवत सिंह 11-10 बजे जिस समय मतगणना कक्ष से बाहर निकले, उस समय वह लगभग 50 हजार मतों से पीछे चल रहे थे। उन्हें अपनी हार दिख गई थी, इसीलिए उन्होंने मतगणना कक्ष से खिसक जाना बेहतर समझा।
वहीं, पूर्व राज्यमंत्री ओमवती चुनाव से पूर्व अपने पति पूर्व आईएएस के साथ भाजपा छोड़कर कांग्रेस में शामिल हुई थीं। जब रुझान आने शुरू हुए तो दोनों मीडिया सेंटर के पास आकर खड़े हो गए। मोदी लहर को देखकर वे भी दंग थे। उनके प्रचार के लिए प्रियंका गांधी, ज्योतिरादित्य सिंधिया बिजनौर में आए, लेकिन, ओमवती अपनी जमानत तक नहीं बचा पाईं। ओमवती और उनके पति आरके सिंह भी आधी मतगणना होने पर ही मतगणना स्थल से चले गए।
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