मेजर मयंक विश्नोई बचपन से ही सेना में जाने के सपने संजोते थे। वह अपने पिता से सेना के बारे में पूछते रहते थे। वह अक्सर परिवार वालों से यही कहते थे कि सिर दर्द की गोली खाने से अच्छा है देश के लिए गोली खाओ। वह जब भी छुट्टी आते थे, अपनी बहनों से कहते थे कि देखना एक दिन तिरंगे में लिपटकर घर आऊंगा।
अब छोटे भाई की ये बातें याद कर बहन तनु और अनु फफक पड़ती हैं। वह कह रही हैं कि जो बात कहता था आज वह सच हो गई। बहन तनु ने बताया कि मयंक हमेशा से ही दुश्मनों को चित करने के लिए सबसे आगे रहता था। घर पर जब भी आता था तो कहता था कि ऑपरेशन के दौरान हमेशा आगे रहता हूं। बहन तनु के आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे हैं। वह छोटे भाई के बलिदान पर गर्व महसूस कर रही हैं, लेकिन इकलौते भाई के जाने का दुख उन्हें सता रहा है।
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Martyr Major Mayank vishnoi, शहीद मेजर मयंक विश्नोई
- फोटो : अमर उजाला
बताया गया कि अप्रैल -2021 को मेजर मयंक आखिरी बार मेरठ आए थे। उन दिनों कोरोना की दूसरी लहर चरम पर रही। पिता, माता और पत्नी कोरोना पॉजिटिव हो गई। यहां भी मेजर ने परिवार की सेवा की। तीनों जल्दी स्वस्थ भी हो गए।
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Martyr Major Mayank vishnoi, शहीद मेजर मयंक विश्नोई
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इसके बाद मेजर मयंक और पत्नी स्वाति 13 मई 2021 को हिमाचल प्रदेश के सुजानपुर रवाना हो गए। हिमाचल प्रदेश के सुजानपुर में ही पत्नी स्वाति का मायका है। वहां से मेजर मयंक शोपियां चले गए। सिग्नल कोर में होने के बाद भी उन्होंने देश सेवा करने के लिए राजपूत राइफल को चुना।
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Martyr Major Mayank vishno, शहीद मेजर मयंक विश्नोई
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कमांडो ट्रेनिंग भी ली थी
मेजर मयंक ने कमांडो ट्रेनिंग भी ली थी। मामा दिनेश विश्नोई ने बताया कि कमांडो ट्रेनिंग के बाद मयंक बतौर इंस्ट्रक्टर भी रहे।
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Martyr Major Mayank vishno, शहीद मेजर मयंक विश्नोई
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उन्होंने बताया कि वह अक्सर कुछ नया करने के लिए तैयार रहते थे। अपने कार्यस्थल पर भी सबसे आगे बढ़कर चलने की आदत उन्हें सबसे अलग बनाती थी। उन्होंने कहा कि आईएमए देहरादून में भी उन्होंने कई मेडल जीते।