उर्दू के दो शब्द हैं रियाज और अख्तर। एक का अर्थ है अभ्यास और दूसरे का तारा। ये दोनों ही मेरठ में जन्मी प्रख्यात लेखिका, शायरा और कवियत्री फहमीदा के उपनाम रहे हैं। पाकिस्तान जा बसी फहमीदा के गुरुवार को निधन की खबर पर मेरठ में उनकी स्मृतियां भी उभर आईं। पुराने किस्से फिर से ताजा हो गए और यहीं से बात निकली कि मेरठ में उनका नाम फहमीदा अख्तर था और शायरी में उन्होंने अपना उपनाम ‘रियाज’ अपने पिता के नाम से लिया था।
क्या है फहमीदा अख्तर से ‘रियाज’ बनने के पीछे का राज, सिर्फ एक क्लिक में जानें...
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नूर अहमद मेरठी की पुस्तक ‘तजकिरा शोरा-ए-मेरठ’ (मेरठ के शायरों की चर्चा) में फहमीदा के बारे में विस्तार से लिखा है। नूर भी मूल रूप से मेरठ के ही थे, लेकिन वे पाकिस्तान चले गए थे और यह पुस्तक ‘इदारा फिक्र-ए-नो’ कराची से प्रकाशित हुई थी। पुस्तक में यही चर्चा बताती है कि फहमीदा रियाज का असल नाम फहमीदा अख्तर था, जो रियाजुद्दीन अहमद की पुत्री थी और मेरठ के मशूहर कंबोह कबीले से थीं।
इस कबीले की स्मृतियों में मेरठ का कंबोह दरवाजा आज भी है। खैर अंदेश खां भी इन्हीं के बुजुर्गों में रहे थे, जिन्होंने खैरनगर दरवाजा और खैरनगर मोहल्ला बसाया। इस खानदान के नवाब वक्कारुल मुल्क (देश गौरव) मुश्ताक हुसैन खां (1841-1917) और डॉ. जियाउद्दीन अहमद (1874-1947) भी फहमीदा के पूर्वज रहे। नाना नवाब शफक्कत हुसैन खां भारत विभाजन से पूर्व डिप्टी कलेक्टर रहे और पहली भारतीय क्रिकेट टीम के खिलाड़ी बने थे।
व्यस्त जीवन व्यतीत किया, अध्यापन भी किया
28 जुलाई 1945 को मेरठ में जन्मी फहमीदा तीन बहनें थीं। प्रारंभिक शिक्षा हैदराबाद सिंध में हासिल की और राजकीय महाविद्यालय से 1966 में बीए किया। सिंध यूनिवर्सिटी में एमए की शिक्षा के दौरान ब्रिटेन चली गईं, जहां से फिल्म तकनीक का कोर्स 1970-72 की अवधि में पूर्ण किया। 1967 में विवाह के बाद दो बेटियां और एक बेटा पैदा हुए। फहमीदा ने व्यस्त जीवन जीया और बीबीसी उर्दू सर्विस के लिए भी कार्य किया। 1975 में एक पत्रिका ‘आवाज’ का प्रकाशन किया। जनरल जियाउल हक के शासन में कई वर्ष दिल्ली में निर्वासित जीवन व्यतीत करने के दौरान जामिया मिल्लिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी में अध्यापन किया।
वह भारत से वापसी के बाद नेशनल बुक कौंसिल की निदेशक और सांस्कृतिक मंत्रालय पाकिस्तान में सलाहकार रहीं। एक एनजीओ ‘इदारा’ का संचालन कर रही थीं, जिसके अधीन महिलाओं द्वारा लिखी गई पुस्तकें प्रकाशित होती रहीं। फहमीदा ने पर्यटन भी खूब किया। अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, इटली, चीन, भारत, कजाकिस्तान और बांगलादेश के दौरे किए, जहां इन देशों की संस्कृति को नजदीक से जाना। 1962 में शायरी की शुरूआत की, जो उन्हें प्रकृति और व्यक्तिगत अध्ययन से प्राप्त हुई और कई किताबें भी लिखीं। यही वह दौर था, जब उन्होंने अपना उपनाम अख्तर के बजाए रियाज किया। प्रख्यात सिंधी शायर शेख अयाज की कृतियों का उर्दू अनुवाद में भी इन्होंने संकलन किया। तीन उपन्यास ‘गोदावरी’, ‘जिंदा बहार’ और ‘कराची जेवर’ प्रकाशित हुईं। मनोविज्ञान पर आधारित पुस्तक ‘अधूरा आदमी’ लिखी। इनकी एक अंग्रेजी पुस्तक ‘पाकिस्तान कोलिन, लिट्रेचर एंड सोसाइटी’ भारत में ही प्रकाशित हुई।