27 अगस्त 2013 से पहले किसी ने सोचा भी नहीं था कि मुजफ्फरनगर में दंगा हो सकता है। दंगे के दौरान मारे गए लोगों के परिजन उस घटना को याद कर आज भी सिहर उठते हैं। अपनों को खोने के गम उनके चेहरों पर साफ झलकता है। आगे स्लाइड्स में जानें आखिर क्यों जरा सी बात पर उठी थी दंगे की लपटें।
दंगे का दंश: नौ साल पहले आज ही के दिन जल उठा था मुजफ्फरनगर, घर जले-गांव छूटे, आज भी हरे हैं जख्म
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बुरा समय था बीत गया
शाहपुर में रह रहे कुटबी गांव के इमरान का कहना है कि बुरा समय था बीत गया। साल गुजर गए, हम पुराने जख्मों को कुरेदना नहीं चाहते। सभी लोग अपने-अपने कार्यों में व्यस्त है। अब हमारे घरों में दंगों का कोई जिक्र नहीं होता है।
किसी को न दिखाए वो दिन
कुटबी गांव के अली हसन का कहना है कि हमारा गांव छूट गया, जहां कई पीढ़ियों से रह रहे थे। बचपन गुजरा था। यादें हैं, यादों को कभी खत्म नहीं किया जा सकता। लेकिन अब हम दंगे को याद नहीं करना चाहते। अब जहां है, बेहद खुश है।
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ये हुआ था उस दिन
सात सितंबर 2013 को नंगला मंदौड़ में पंचायत बुलाई गई थी। पंचायत में जिले के राजनीतिक और सामाजिक क्षेत्रों के दिग्गज पहुंचे, लेकिन भीड़ अनियंत्रित थी। पंचायत का फैसला आते-आते जिले के कई क्षेत्रों में झगड़े शुरू हो गए थे। पंचायत से लौटते लोगों पर जिले के कई क्षेत्रों में हमले हुए। इसके बाद सात सितंबर की रात और आठ सितंबर की सुबह दंगा भड़का था।
दर्ज हुए थे 534 मुकदमे
मुजफ्फरनगर दंगे के दौरान दोनों पक्षों की ओर से 534 मुकदमे दर्ज हुए थे। इनमें से 80 मुकदमे सेशन कोर्ट में विचाराधीन है। अन्य मुकदमों का मजिस्ट्रेट ट्रायल चल रहा है। तीन सौ मुकदमों में चार्जशीट दाखिल की गई थी। 150 मुकदमों में एफआर लगाई गई थी।