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काशी में कैलाश सत्यार्थी, जानें नोबल पुरस्कार तक का सफर

Tue, 17 Jan 2017 06:38 PM IST
टीम डिजिटल, वाराणसी
टीम डिजिटल, वाराणसी Updated Tue, 17 Jan 2017 06:38 PM IST
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Nobel Prize Kailash Satyarthi in Varanasi
Kailash Satyarthi - फोटो : twitter

दुनिया के 144 देशों के हजारों बच्चों को उनके परिवार से मिलाने और उन्हें उनका हक दिलाने का भगीरथ प्रयास करने वाले नोबल पुरस्कार विजेता कैलाश सत्यार्थी आज बनारस में हैं। कैलाश सत्यार्थी ने अपने संगठन बचपन बचाओ आंदोलन के जरिये न केवल भारत में बल्कि पूरे विश्व में बाल अधिकारों के लिए मुहिम चला रहे हैं। कैलाश सत्यार्थी आज अपने दो दिनी बनारस दौरे पर आए हैं। वह कल बीएचयू में छात्रों के साथ संवाद करेंगे। आईए जानते हैं, उनके जीवन और नोबल पुरस्कार तक के सफर के बारे में -

Nobel Prize Kailash Satyarthi in Varanasi
Kailash Satyarthi - फोटो : twitter

कैलाश सत्यार्थी का जन्म मध्य प्रदेश के विदिशा जिले में हुआ था। उन्होंने इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की और इसी क्षेत्र में बाद में अध्यापन कार्य भी किया। इसी दौरान उन्हें देश में बच्चों की दयनीय दशा से बेहद दुःख हुआ। कैलाश सत्यार्थी ने शिक्षक का पेशा छोड़ बच्चों के कुछ करने की ठानी। वर्ष 1980 में कैलाश सत्यार्थी ने अपने संगठन बचपन बचाओ आंदोलन की स्‍थापना की। कैलाश का मानना है कि शांतिपूर्ण विश्व के लिए बच्चों और युवाओं के अधिकारों का संरक्षण बेहद जरूरी है। बच्चों को बालश्रम से बचाने के इस महा मिशन के लिए उन्होंने शांति के पुजारी राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का अहिंसा का मार्ग चुना।

Nobel Prize Kailash Satyarthi in Varanasi
Kailash Satyarthi - फोटो : twitter

वर्ष 1980 के दशक में बच्चों के साथ कई-कई घंटे काम कराया जाता था और उन्हें पैसा भी नहीं दिया जाता ‌था। देश में हजारों बच्चे कारखानों, फैक्ट्रियों में बंधुआ मजदूर बन गए थे। कई बार तो बच्चों के साथ दासों के जैसा व्यवहार किया जाता था। सत्यार्थी और उनके कुछ सहयोगियों ने ऐसे स्‍थानों पर गुरिल्ला तरीके से छापेमारी की और बंधुआ मजदूरों को मुक्त कराना शुरु किया। उन्‍होंने सड़कों पर बालश्रम के ‌खिलाफ प्रदर्शन किया। बचपन बचाओं आंदोलन ने कारखानों से छुड़ाए गए बच्चों के लिए पुर्नवास केंद्र बनाए जहां उन्हें पढ़ाई के साथ्‍ा सामान्य जीवन बिताने का फिर एक मौका दिया गया।

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Nobel Prize Kailash Satyarthi in Varanasi
Kailash Satyarthi - फोटो : अमर उजाला

कैलाश सत्यार्थी की इस सक्रियता ने पूरे विश्व में एक मुहिम का रुप ले लिया। उन्होंने अपनी इस मुहिम में पाकिस्तान, नेपाल, श्रीलंका और बांग्लादेश के मानवाधिकार समूहों को भी जोड़ा। कैलाश सत्यार्थी ने वर्ष 1998 में ग्लोबल मार्च अगेंस्ट चाइल्ड लेबर निकाला। इस मार्च में 103 देशों के 72 लाख लोगों ने हिस्सा लिया। उनके प्रयासों का ही असर है कि विश्व श्रम संगठन ने कन्वेंशन 182 पारित किया जो पूरे में विश्व में आज बाल श्रम के खिलाफ कानूनों के लिए नजीर बन गया है।

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Nobel Prize Kailash Satyarthi in Varanasi
Kailash Satyarthi - फोटो : twitter

इसी दौरान कालीन नगरी के नाम से मशहूर भदोही समेत पूरे पूर्वांचल में कालीन उद्योग में बच्चों से दासों की तरह काम कराया जाता था। कैलाश सत्यार्थी ने ऐसे बच्चों को आजाद कराने का बीड़ा उठाया। उन्होंने वर्ष 1994 में कालीन उद्योग के लिए रुगमार्क की स्‍थापना की । इस रुगमार्क से पता चलता है कि उक्त कालीन में बालश्रम का इस्तेमाल नहीं किया गया है। इस मार्क को व्यापक पैमाने पर मान्यता मिली। अब रुगमार्क को गुडवेब इंटरनेशनल के नाम से जाना जाता है। रुगमार्क को वर्ष 1994 में नेपाल में भी शुरु किया गया।

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