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सारनाथ अब वर्ल्ड हेरिटेज: 1993 से 2025 तक शोध, सर्वे और वैश्विक मूल्यांकन ने तय की ऐतिहासिक पहचान; तस्वीरें

Sun, 26 Jul 2026 10:57 AM IST
Aman Vishwakarma अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी।
अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी। Published by: Aman Vishwakarma Updated Sun, 26 Jul 2026 10:57 AM IST
सार

Sarnath Varanasi: 58 वर्ष की वैज्ञानिक शोध यात्रा और 28 वर्ष लंबी आधिकारिक प्रक्रिया के बाद सारनाथ को यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में स्थान मिला। इस उपलब्धि की शुरुआत अमेरिका से हुई पहल से मानी जाती है, जबकि बीएचयू के वैज्ञानिकों के शोध ने महत्वपूर्ण आधार प्रदान किया। विशेषज्ञों के अनुसार यह मान्यता सारनाथ की वैश्विक ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्ता को रेखांकित करती है।

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Sarnath World Heritage Site Research, surveys global evaluation spanning 1993 to 2025 cemented its historic st
सर्वे और वैश्विक मूल्यांकन ने तय की ऐतिहासिक पहचान। - फोटो : संवाद

गौतम बुद्ध के प्रथम उपदेश स्थल सारनाथ का यूनेस्को विश्व धरोहर सूची तक पहुंचना केवल एक प्रशासनिक उपलब्धि नहीं, बल्कि लगभग छह दशक तक चले वैज्ञानिक शोध, अंतरराष्ट्रीय सहयोग और सांस्कृतिक संरक्षण के प्रयासों का परिणाम है। 



आधिकारिक नामांकन प्रक्रिया भले ही 1998 में संभावित सूची से शुरू हुई और 28 वर्षों बाद विश्व धरोहर सूची तक पहुंची, लेकिन इसकी वैज्ञानिक नींव वर्ष 1968 में ही रख दी गई थी, जब अमेरिका और उत्तर प्रदेश सरकार के सहयोग से सारनाथ को वैश्विक स्तर पर स्थापित करने की पहल शुरू हुई। इस पूरी यात्रा में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एसआई), काशी हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) और अंतरराष्ट्रीय संस्था आईसीओएमओएस की महत्वपूर्ण भूमिका रही।

बीएचयू के प्रो. राणा पीबी सिंह बताते हैं कि यूनेस्को की विश्व धरोहर प्रणाली औपचारिक रूप से अस्तित्व में आने के कुछ वर्षों बाद ही सारनाथ पर अंतरराष्ट्रीय स्तर का वैज्ञानिक अध्ययन शुरू हो चुका था। वर्ष 1968 में अमेरिका और उत्तर प्रदेश सरकार के सहयोग से सारनाथ की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्ता पर काम शुरू किया गया। इसके बाद 1993 में प्रो. सिंह और अन्य इतिहासकारों व वैज्ञानिकों ने पहली बार अंतरराष्ट्रीय जर्नल में सारनाथ पर शोध प्रकाशित किया। इस शोध में विस्तार से बताया गया कि इतनी महत्वपूर्ण बौद्ध विरासत होने के बावजूद सारनाथ अभी तक यूनेस्को की सूची में क्यों शामिल नहीं हो पाया।

Sarnath World Heritage Site Research, surveys global evaluation spanning 1993 to 2025 cemented its historic st
सारनाथ में गौतम बुद्ध की प्रतिमा। - फोटो : संवाद

तीन अंतरराष्ट्रीय शोध, आईसीओएमओएस की भूमिका और 2025 का निर्णायक सर्वे
प्रो. राणा पीबी सिंह ने सारनाथ पर तीन महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय शोध प्रकाशित किए। अंतर्राष्ट्रीय स्मारक और स्थल परिष (आईसीओएमओएस) की समिति के सदस्य के रूप में उन्होंने नामांकन प्रक्रिया में भी सक्रिय भूमिका निभाई। वर्ष 2024 में सारनाथ का संशोधित प्रस्ताव आईसीओएमओएस के समक्ष प्रस्तुत किया गया।

अक्टूबर 2025 में बांग्लादेश के प्रोफेसर मोहम्मद हबीब आईसीओएमओएस के नामित विशेषज्ञ के रूप में सारनाथ पहुंचे। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों के साथ विस्तृत सर्वेक्षण किया। जिन बिंदुओं पर सुधार की आवश्यकता थी, उन्हें पूरा किया गया। दिसंबर 2025 में अंतिम रिपोर्ट तैयार हुई, जिसे जनवरी और फरवरी में आईसीओएमओएस को सौंपा गया। इसके बाद आईसीओएमओएस ने अपनी अनुशंसा के साथ प्रस्ताव यूनेस्को को भेज दिया।

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2023 के शोध ने उजागर कीं सारनाथ की विकास संबंधी चुनौतियां। - फोटो : संवाद

2023 के शोध ने उजागर कीं सारनाथ की विकास संबंधी चुनौतियां
वर्ष 2023 में प्रकाशित अपने शोध में प्रो. राणा पीबी सिंह ने बताया कि बौद्ध धर्म का प्रमुख तीर्थ होने के बावजूद सारनाथ, बोधगया और लुंबिनी जैसी धार्मिक एवं पर्यटन पहचान विकसित नहीं कर सका। शोध के अनुसार भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा संरक्षित पुरातात्विक पार्क में धार्मिक अनुष्ठानों पर प्रतिबंध होने के कारण बौद्ध तीर्थयात्री मुख्य स्तूप पर प्रार्थना नहीं कर पाते और उन्हें अपने-अपने मठों तक सीमित रहना पड़ता है।

इससे स्थल की आध्यात्मिक जीवंतता प्रभावित होती है। शोध में यह भी उल्लेख किया गया कि सारनाथ की कोई स्वतंत्र प्रशासनिक व्यवस्था नहीं है और यह वाराणसी नगर निगम के एक वार्ड के रूप में संचालित होता है। इसके अलावा अधिकांश पर्यटक वाराणसी में ही ठहरते हैं और सारनाथ की यात्रा केवल आधे दिन तक सीमित रखते हैं। सीमित आवास सुविधाएं भी यहां पर्यटन विस्तार में बाधा बनती रही हैं।

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सारनाथ अब वर्ल्ड हेरिटेज बना। - फोटो : संवाद

विश्व धरोहर का दर्जा : संरक्षण से आगे, वैश्विक जिम्मेदारी
यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल होने के साथ ही सारनाथ केवल भारत की सांस्कृतिक धरोहर नहीं, बल्कि पूरी मानवता की साझा विरासत के रूप में मान्यता प्राप्त कर चुका है। इससे अंतरराष्ट्रीय संरक्षण, वैज्ञानिक सहयोग, वैश्विक पर्यटन और सांस्कृतिक शोध के नए अवसर खुलेंगे। वहीं इस ऐतिहासिक उपलब्धि के पीछे 58 वर्षों की शोध यात्रा, 28 वर्षों की आधिकारिक प्रक्रिया और भारतीय तथा अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों के निरंतर प्रयास दर्ज हो गए।

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सारनाथ में परीक्षण के दाैरान। - फोटो : संवाद

काशी आने वाले पर्यटकों में सबसे अधिक 7 देशों से
पर्यटन विभाग के आंकड़ों के अनुसार काशी में हर साल 1 लाख विदेशी पर्यटकों का आवागमन होता है। इसमें सबसे अधिक पर्यटक 7 देशों से आते हैं। इनमें जापान, श्रीलंका, दक्षिण कोरिया, कंबोडिया, थाईलैंड, म्यांमार और भूटान से आते हैं। हालांकि बीते दो वर्षों के आंकड़ों के अनुसार सबसे अधिक पर्यटक जापान, श्रीलंका और दक्षिण कोरिया से आए हैं। अगर दो वर्षों का आंकड़ा देखें तो सारनाथ में कुल 66,661 पर्यटक आए हैं।

1999 में सारनाथ में हुई भगवान बुद्ध के 28 रूपों की प्राण प्रतिष्ठा
1999 में 17 नवंबर को भगवान बुद्ध के 28 रूपों की सारनाथ में प्राण प्रतिष्ठा की गई। यह संगमरमर की प्रतिमाएं म्यांमार से आई थीं। वहां के 28 बौद्ध धर्म के अनुयायी परिवारों ने इन्हें दिया था। इनमें 27 डेढ़ फीट और एक प्रतिमा ढाई फीट ऊंची थीं। इन्हें अलग-अलग नाम दिए गए थे। इन्हें गौतम, कस्साया, कोनागामाना, काकूसंघा, वस्सभू, सिखी, विपस्सि, फुस्सा, टिस्सा, सिर्द्धाथा, धम्मदासी, अट्ठादासी, पियादासी, सुजाता, सुमेधा, पद्मतारा, नारदा, पद्मा, एनोमादस्सी, सोमीता, रेवत, सुमन, मंगला, कोडन्ना, दीपांकर, सरांकर, मेघांकर तंधांकर नाम से जाना जाता है।

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