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विश्व पर्यटन दिवसः इस हवेली में संरक्षित है काशी का शिल्प वैभव, रजवाड़ों की शानों-शौकत का है प्रमाण

Thu, 27 Sep 2018 01:23 PM IST
पूजा सिंह,अमर उजाला,वाराणसी
पूजा सिंह,अमर उजाला,वाराणसी Updated Thu, 27 Sep 2018 01:23 PM IST
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World tourism day varanasi this haveli has culture of kashi
varanasi - फोटो : अमर उजाला
वेदों, पुराणों में वर्णित काशी के घाट और मंदिर ही नहीं बल्कि यहां के महल और हवेलियां भी नायाब हैं। पुराने महाल भदैनी की हवेली इसका जीता जागता उदाहरण है। काशी के वैभव शिल्प को संजोये इस हवेली का जर्रा-जर्रा सीधा संवाद तो करता ही है रजवाड़ों की शानों-शौकत का प्रमाण भी बताता है। आगे की स्लाइड्स में देखें तस्वीरें....


 
World tourism day varanasi this haveli has culture of kashi
varanasi - फोटो : अमर उजाला

स्थापत्य कला को संजोये ये हवेली अट्ठारहवीं सदी के शुरुआत में जाने माने रईस सीताराम साव की हुआ करती थी। साव परिवार के पतन के बाद लगभग चालीस साल तक यह बंद रही। इसके बाद हरियाणा से आए व्यापारी गोपाल राव इस धरोहर के  मालिक बने और इसका जीर्णोद्घार कराया। मुख्य द्वार से जैसे ही हम हवेली को जोड़ने वाले गलियारे में घुसते हैं हाथों से गढ़ी गई मूर्ति गूढ़ स्थापत्य कला की गवाही देती है।

 
World tourism day varanasi this haveli has culture of kashi
varanasi - फोटो : अमर उजाला

दीवान खाने से जुड़ी हवेली में लंबे-चौड़े कई कक्ष हैं। हवेली के अंदर घुसते ही दाहिने तरफ का कमरा कभी जनाना खाने के नाम से जाना जाता था। लाल लकड़ी के आलीशान दरवाजे और शानदार झरोखे इस हवेली की खूबसूरती को और बढ़ा देते हैं। आठ से नौ हजार वर्ग फीट की इस हवेली में 20 से 25 कमरे हैं। सीढ़ियों से ऊपर जाने के बाद नीचे झांकने पर भवन के आंगन की खूबसूरती भी देखते बनती है। हवेली की छत से जुड़ी अटारियां चौड़े छज्जों की शोभा बढ़ाती हैं। 
 
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varanasi - फोटो : अमर उजाला

हवेली की दूसरी मंजिल पर राधा-कृष्ण का खूबसूरत मंदिर भी है। यही नहीं इस हवेली में चार सौ साल पुराना कूप भी संरक्षित है, जिसका जलस्तर गंगा के घटने के साथ घटता और बढ़ने के साथ बढ़ता है। हवेली के मालिक गोपाल राव बताते हैं कि आज भी वो लोग पीने के पानी के रूप में इस कूप के जल का ही इस्तेमाल करते हैं। 
 
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World tourism day varanasi this haveli has culture of kashi
varanasi - फोटो : amar ujala

कूप के जल का स्वाद संकटमोचन मंदिर स्थित पुराने कुएं के जल के  जैसा ही लगता है। हवेली स्थित मंदिर में हनुमान जी का रूप अहिरावण कथा पर आधारित है। हवेली की खासियत यह है कि इसके चारों तरफ रास्ता है और बाहर की आवाज हवेली के अंदर नहीं पहुंचती। 
 
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