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बांके बिहारी मंदिर: पत्थरों को नहीं मिल रही सांस, इसलिए जर्जर हो रहीं दीवारें; रिपोर्ट में चौंकाने वाला खुलासा
अमर उजाला न्यूज नेटवर्क, आगरा
Published by: Dhirendra Singh
Updated Fri, 12 Jun 2026 09:07 AM IST
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सार
वृंदावन के बांकेबिहारी मंदिर की दीवारों पर चढ़ी पॉलीमर की परत लाल बलुआ पत्थरों को नुकसान पहुंचा रही थी, जिससे उनमें नमी फंसकर संरचना कमजोर हो रही थी। एएसआई की विज्ञान शाखा अब वैज्ञानिक तरीके से परत हटाकर केमिकल ट्रीटमेंट कर रही है, जिससे मंदिर की आयु बढ़ सके।
बांके बिहारी मंदिर
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
श्रीबांकेबिहारी मंदिर की नींव और संरचना ही कमजोर नहीं हो रही, बल्कि पूर्व में मंदिर की दीवारों पर लगाए गए पेंट के कारण यहां लगे पत्थर सांस नहीं ले पा रहे थे। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने मंदिर की संरचना का सर्वेक्षण कर हाईपावर कमेटी को रिपोर्ट सौंपी थी। वहीं एएसआई की विज्ञान शाखा के वैज्ञानिक मंदिर की दीवारों का केमिकल ट्रीटमेंट कराने में मदद कर रहे हैं। दीवारों पर लगी पॉलीमर की परत को हटवाकर वैज्ञानिक तरीके से ट्रीटमेंट किया जा रहा है, जिससे मंदिर के पत्थरों की आयु बढ़ जाएगी।
पॉलीमर की परत
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
वृंदावन के ठाकुर श्रीबांकेबिहारी मंदिर का निर्माण लाल बलुई पत्थर से किया गया है। वर्ष 1864 में लाल पत्थर से बने मंदिर की दीवारों पर पॉलीमर की परत चढ़ा दी गई थी। सर्वेक्षण में एएसआई ने इसे मंदिर की सेहत के लिए खराब बताया। इसके बाद एएसआई की विज्ञान शाखा से सहयोग मांगा गया। आगरा सर्किल के एएसआई विज्ञान शाखा के अधिकारियों की टीम ने हाईपावर कमेटी के निर्देश पर केमिकल ट्रीटमेंट कराने का काम शुरू कराया।
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पत्थर
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
विशेषज्ञों की सलाह से मंदिर की दीवारों से पॉलीमर की परत हटवाई जा रही है। अन्य हिस्सों की वैज्ञानिक ढंग से सफाई के बाद यहां पत्थर के अनुकूल रिवर्सिबल कोटिंग कराई जा रही है। मंदिर के मुख्य प्रवेश द्वार के ऊपरी हिस्से के साथ दीवारों का ट्रीटमेंट हो चुका है। कुछ काम बाकी है। ट्रीटमेंट से लाल पत्थर की उम्र बढ़ेगी, जबकि पॉलीमर पेंट से नुकसान पहुंच रहा था।
झड़ता हुआ लाल पत्थर
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
सांस लेने वाली चट्टान है लाल पत्थर
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के पूर्व इंंजीनियर एमसी शर्मा के मुताबिक लाल बलुई पत्थर (रेड सैंड स्टोन) छिद्रपूर्ण और सांस लेने की प्रकृति का होता है। इस पर पॉलीमर या सिंथेटिक पेंट की कोटिंग से प्राकृतिक गुण नष्ट हो जाते हैं। इसका सबसे बड़ा नुकसान ये है कि पत्थर के अंदर नमी कैद हो जाती है, जो दबाव से पपड़ी बनकर टूटने लगती है। धूप और गर्मी से नमी भाप बनकर पत्थर को कमजोर करती है। पॉलीमर युक्त कोटिंग अल्ट्रावॉयलेट किरणों के संपर्क में आने पर पीली या भूरी दिखने लगती है। इससे बाल बलुआ पत्थर का प्राकृतिक रंग खराब होने लगता है। कुछ पॉलीमर पत्थर में मौजूद खनिजों के साथ प्रतिक्रिया करके इसे अंदर से खोखला कर देते हैं।
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के पूर्व इंंजीनियर एमसी शर्मा के मुताबिक लाल बलुई पत्थर (रेड सैंड स्टोन) छिद्रपूर्ण और सांस लेने की प्रकृति का होता है। इस पर पॉलीमर या सिंथेटिक पेंट की कोटिंग से प्राकृतिक गुण नष्ट हो जाते हैं। इसका सबसे बड़ा नुकसान ये है कि पत्थर के अंदर नमी कैद हो जाती है, जो दबाव से पपड़ी बनकर टूटने लगती है। धूप और गर्मी से नमी भाप बनकर पत्थर को कमजोर करती है। पॉलीमर युक्त कोटिंग अल्ट्रावॉयलेट किरणों के संपर्क में आने पर पीली या भूरी दिखने लगती है। इससे बाल बलुआ पत्थर का प्राकृतिक रंग खराब होने लगता है। कुछ पॉलीमर पत्थर में मौजूद खनिजों के साथ प्रतिक्रिया करके इसे अंदर से खोखला कर देते हैं।