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सुहाने लगी ‘नन्हीं चिरईया’: बेटा-बेटी का घटा भेद...आगरा में बढ़ीं बेटियां की संख्या, जन्म दर में हुआ सुधार
धर्मेंद्र त्यागी, अमर उजाला न्यूज नेटवर्क, आगरा
Published by: धीरेन्द्र सिंह
Updated Sat, 24 Jan 2026 02:26 PM IST
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सार
आगरा जिले में बेटियों की जन्म दर में सुधार हुआ है। बीते पांच साल में इनकी जन्म दर डेढ़ गुना बढ़ी है, जिससे अब प्रति हजार बालकों पर अब 952 बेटियां हैं। वर्ष 2021 में ये आंकड़ा 885 था।
नवजात शिशु (सांकेतिक तस्वीर)
- फोटो : freepik.com
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विस्तार
ओरी चिरईया नन्हीं सी चिड़िया अंगना में फिर आ जा रे...। बेटियों के लिए फिल्माया ये गीत साकार हो रहा है। बेटा-बेटी में अंतर की दीवार ढह रही है। बड़ी होकर ये कर्नल सोफिया कुरैशी, दीप्ति शर्मा जैसी बनेंगी। इसी सोच से नन्हीं चिरईयाें की संख्या तेजी से बढ़ रही है। जिले में बेटों के मुकाबले बेटियों की संख्या रिकाॅर्ड 952 हो गई है। आने वाले वर्षों में ये आंकड़ा और बढ़ने की उम्मीद है।
नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे में आगरा में बेटियों की संख्या में भारी वृद्धि मिली है। इसमें 6 साल तक के बालक-बालिकाओं के सर्वे में औसत 1000/952 हो गया है। पांच साल में प्रति हजार बालकों पर 31 बेटियां बढ़ गई है। खास बात ये है कि शहर-देहात दोनों में ही बच्चियों की संख्या बढ़ी है। वर्ष 2011 में बालिकाओं का औसत 861 था जो वर्ष 2021 में बढ़कर 921 हो गया है। शिक्षा, सेना, खेलकूद समेत हर क्षेत्र में बेटियों के बढ़ते प्रभाव से लोगों के सोच को बदल दिया है। कई ऐसे परिवार हैं, जिन्होंने बेटी होने पर बेटे की चाह नहीं रखी। सीएमओ डॉ. अरुण श्रीवास्तव ने बताया कि घर की बुजुर्ग महिलाएं बेटा-बेटी में अंतर करती थीं। गर्भवती होने पर आशा और चिकित्सकों की टीम इन बुजुर्गाें को बेटियों के महत्व बताते हुए भी जागरूक करते हैं। बाकी की कमी बेटियों के सफलता ने पूरी कर दी।
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नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे में आगरा में बेटियों की संख्या में भारी वृद्धि मिली है। इसमें 6 साल तक के बालक-बालिकाओं के सर्वे में औसत 1000/952 हो गया है। पांच साल में प्रति हजार बालकों पर 31 बेटियां बढ़ गई है। खास बात ये है कि शहर-देहात दोनों में ही बच्चियों की संख्या बढ़ी है। वर्ष 2011 में बालिकाओं का औसत 861 था जो वर्ष 2021 में बढ़कर 921 हो गया है। शिक्षा, सेना, खेलकूद समेत हर क्षेत्र में बेटियों के बढ़ते प्रभाव से लोगों के सोच को बदल दिया है। कई ऐसे परिवार हैं, जिन्होंने बेटी होने पर बेटे की चाह नहीं रखी। सीएमओ डॉ. अरुण श्रीवास्तव ने बताया कि घर की बुजुर्ग महिलाएं बेटा-बेटी में अंतर करती थीं। गर्भवती होने पर आशा और चिकित्सकों की टीम इन बुजुर्गाें को बेटियों के महत्व बताते हुए भी जागरूक करते हैं। बाकी की कमी बेटियों के सफलता ने पूरी कर दी।
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ये भी बनी बड़ी वजह:-
पीसीपीएनडीटी एक्ट: घटते लिंगानुपात को सुधारने और कन्या भ्रूण हत्या रोकने के लिए 1994 में ये कानून लागू किया। इसमें गर्भस्थ शिशु का लिंग जांचना कानूनी अपराध है। इसकी सख्ती से बीते 10 साल में बेटियों की संख्या बढ़ी है।
बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ: केंद्र सरकार की बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ अभियान का भी सकारात्मक प्रभाव पड़ा। लोगों की समझ में आया कि बेटियों बिना दुनिया की कल्पना नहीं की जा सकती है। इसमें सेलिब्रिटी ने भी सक्रिय भूमिका निभाई।
सरकारी योजनाएं: बेटियों के जन्म, पढ़ाई, रोजगार, विवाह के लिए कई सरकारी योजनाएं हैं। इसके बलबूते कई बेटियां सफलता के शिखर पर भी पहुंची। इसके चलते बेटियों को भी बेटों के मुकाबले कमतर न मानते हुए उभरने के बराबर मौके दिए।
पीसीपीएनडीटी एक्ट: घटते लिंगानुपात को सुधारने और कन्या भ्रूण हत्या रोकने के लिए 1994 में ये कानून लागू किया। इसमें गर्भस्थ शिशु का लिंग जांचना कानूनी अपराध है। इसकी सख्ती से बीते 10 साल में बेटियों की संख्या बढ़ी है।
बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ: केंद्र सरकार की बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ अभियान का भी सकारात्मक प्रभाव पड़ा। लोगों की समझ में आया कि बेटियों बिना दुनिया की कल्पना नहीं की जा सकती है। इसमें सेलिब्रिटी ने भी सक्रिय भूमिका निभाई।
सरकारी योजनाएं: बेटियों के जन्म, पढ़ाई, रोजगार, विवाह के लिए कई सरकारी योजनाएं हैं। इसके बलबूते कई बेटियां सफलता के शिखर पर भी पहुंची। इसके चलते बेटियों को भी बेटों के मुकाबले कमतर न मानते हुए उभरने के बराबर मौके दिए।
ये बोले:
बेटों से आगे निकल रही हैं बेटियां:
नोडल प्रभारी जन्म-मृत्यु सेल डॉ. अंशुल पारीक ने बताया कि अस्पतालों में बेटी पैदा होने पर अब किसी को दुख मनाते नहीं देखते। सरकारी योजनाएं, जागरूकता अभियान के कारण बेटियों की संख्या और बढ़ने की उम्मीद है।
बेटों से आगे निकल रही हैं बेटियां:
नोडल प्रभारी जन्म-मृत्यु सेल डॉ. अंशुल पारीक ने बताया कि अस्पतालों में बेटी पैदा होने पर अब किसी को दुख मनाते नहीं देखते। सरकारी योजनाएं, जागरूकता अभियान के कारण बेटियों की संख्या और बढ़ने की उम्मीद है।
बेटियां भी संभाल रहीं है विरासत
जयपुर हाउस निवासी पूर्वा जैन का कहना है कि दौर बदल गया है। अब बेटियां लड़ाकू विमान उड़ा रही हैं। खेलों में देश का नाम रोशन कर रही हैं। अब बेटियां भी विरासत संभाल रही हैं।
जयपुर हाउस निवासी पूर्वा जैन का कहना है कि दौर बदल गया है। अब बेटियां लड़ाकू विमान उड़ा रही हैं। खेलों में देश का नाम रोशन कर रही हैं। अब बेटियां भी विरासत संभाल रही हैं।
बेटियां भार नहीं, सम्मान हैं
शाहगंज निवासी शालिनी अग्रवाल का कहना है कि मेरी दो बेटियां हैं, जिनका बेटों की तरह ही पालन-पोषण कर रही हूं। बेटियां भी अपने परिवार का नाम रोशन करेंगी। अब बेटियां भार नहीं सम्मान हैं।
साल औसत
2001 866
2011 861
2021 921
2025 952
शाहगंज निवासी शालिनी अग्रवाल का कहना है कि मेरी दो बेटियां हैं, जिनका बेटों की तरह ही पालन-पोषण कर रही हूं। बेटियां भी अपने परिवार का नाम रोशन करेंगी। अब बेटियां भार नहीं सम्मान हैं।
साल औसत
2001 866
2011 861
2021 921
2025 952
