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UP: 140 रुपये के गबन पर दर्ज हुई थी एफआईआर, 33 साल तक चला केस, अब सिपाही को मिली बड़ी राहत; जानें पूरा मामला
संवाद न्यूज एजेंसी, आगरा
Published by: Arun Parashar
Updated Tue, 31 Mar 2026 12:28 PM IST
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सार
140 रुपये के गबन के आरोप में सिपाही पर 33 साल तक केस चला। मामले में सिपाही को बड़ी राहत मिली है। कोर्ट ने साक्ष्य के अभाव में सिपाही को बरी कर दिया।
कोर्ट
- फोटो : ANI
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विस्तार
140 रुपये के गबन के आरोप में 33 साल पहले फंसे एक सिपाही को विशेष मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट-अचल प्रताप सिंह ने साक्ष्य के अभाव में बरी कर दिया। सिपाही पर एस्कोर्ट ड्यूटी में होने के बाद भी तीन दिन का भत्ता लेने का आरोप लगा था। प्रकरण में जीआरपी के तत्कालीन पुलिस उपाधीक्षक ने आगरा कैंट स्थित जीआरपी थाना में प्राथमिकी दर्ज कराई थी।
तत्कालीन उपाधीक्षक व्यास देव श्रोतिया की ओर से 27 मई 1993 को दर्ज कराई गई प्राथमिकी के अनुसार जीआपी में तैनात सिपाही रामअवतार ने होमगार्ड वीरेंद्र सिंह और अनिल कुमार त्यागी के साथ झांसी पेसेंजर में आगरा कैंट से धौलपुर तक 1 सितंबर 1991 से 8 सितंबर 1991 तक सात दिन तक जाना बताया था। इसके एवज में 6 फरवरी 1992 को 140 रुपये भत्ता प्राप्त किया। जांच में पता चला कि सिपाही मात्र तीन दिन एस्कोर्ट ड्यूटी में गए थे। 140 रुपये के शासकीय धन का गबन कराने पर कानूनी कार्रवाई शुरू हुई।
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तत्कालीन उपाधीक्षक व्यास देव श्रोतिया की ओर से 27 मई 1993 को दर्ज कराई गई प्राथमिकी के अनुसार जीआपी में तैनात सिपाही रामअवतार ने होमगार्ड वीरेंद्र सिंह और अनिल कुमार त्यागी के साथ झांसी पेसेंजर में आगरा कैंट से धौलपुर तक 1 सितंबर 1991 से 8 सितंबर 1991 तक सात दिन तक जाना बताया था। इसके एवज में 6 फरवरी 1992 को 140 रुपये भत्ता प्राप्त किया। जांच में पता चला कि सिपाही मात्र तीन दिन एस्कोर्ट ड्यूटी में गए थे। 140 रुपये के शासकीय धन का गबन कराने पर कानूनी कार्रवाई शुरू हुई।
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अदालत में आरोप दाखिल होने के बाद आरोपी ने आत्मसमर्पण कर जमानत कराई थी। अभियोजन की तरफ से तत्कालीन पुलिस उपाधीक्षक व्यासदेव, विवेचक ताराचंद त्यागी, विवेचक देवेंद्र सिंह व अन्य की गवाही हुई। वादी मुकदमा की गवाही तो दर्ज हो गई, लेकिन अधिवक्ता से जिरह करने के लिए हाजिर नहीं हुए। विधिक प्राविधान के अनुसार उनकी गवाही को आरोपी के खिलाफ प्रतिकूल नहीं पाने और जिस अवधि के दौरान आरोपी के अवैध भत्ता क्लेम करने का उस पर आरोप लगाया गया, उसकी जनरल डायरी को अदालत में पेश कर साबित नहीं कराया गया। अदालत ने जब जीडी मंगाने के लिए निर्देश दिए तो जीआरपी पुलिस अधीक्षक ने अवगत कराया कि पुलिस रेगुलेशन के नियमानुसार रोजनामचा आम पुलिस प्रपत्र संख्या 217 के अनुसार पांच वर्ष की अवधि के बाद नष्ट कर दिया गया। साक्ष्य के अभाव ने आरोपी को बरी कर दिया।
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