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UP: छोटा हाजिरी की चाय से शुरू होती थी आगरा छावनी की सुबह, अंग्रेजी हुकूमत के सख्त नियमों में शामिल था ये आदेश

अबरार अहमद, अमर उजाला न्यूज नेटवर्क, आगरा Published by: Dhirendra Singh Updated Thu, 21 May 2026 01:01 PM IST
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सार

आगरा छावनी में ब्रिटिश काल के दौरान 'छोटा हाजिरी' नाम से सुबह की चाय की परंपरा शुरू हुई, जो अंग्रेज अधिकारियों की दिनचर्या का अहम हिस्सा थी। धीरे-धीरे यही परंपरा आगरा के स्थानीय जीवन में घुलकर बेड टी और आधुनिक चाय संस्कृति का आधार बन गई।

From Chhota Haziri to Bed Tea: How Tea Culture Began in British Era Agra Cantonment
छोटा हाजिरी की चाय से शुरू होती थी आगरा छावनी की सुबह - फोटो : AI
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विस्तार

चाय और ताजनगरी की जुगलबंदी सदियों पुरानी है। ब्रिटिश काल में आगरा नॉर्थ-वेस्टर्न प्रोविंसेस का एक प्रमुख केंद्र और एक बड़ी सैन्य छावनी था। 19वीं सदी के ब्रिटिश संस्मरणों और डायरियों में आगरा और उत्तर भारत की सैन्य छावनियों में 'छोटा हाजिरी' का खूब जिक्र मिलता है। दरअसल, यह सुबह की पहली चाय का हिंदुस्तानी नाम था।
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अंग्रेज अधिकारियों और उनकी पत्नियों की डायरियों में इस बात का जिक्र मिलता है कि आगरा की भयंकर गर्मी से बचने के लिए अंग्रेज अधिकारी सुबह जल्दी उठ जाया करते थे। बिस्तर से उठते ही उन्हें सबसे पहले जो चीज चाहिए होती थी, वह थी चाय की प्याली और टोस्ट। इस पूरी रस्म को 'छोटा हाजिरी' कहा जाता था। नौकरों के लिए सख्त निर्देश थे कि सूरज निकलने से पहले अंग्रेज साहब और मेमसाहब के कमरे में चाय पहुंच जानी चाहिए। आगरा छावनी से शुरू हुआ यह टी-कल्चर धीरे-धीरे पूरे शहर के मध्यवर्गीय परिवारों में भी बेड-टी के रूप में लोकप्रिय हो गया।
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ब्रिटिश लेखिका फैनी पार्क्स ने 1850 में लिखी अपनी मशहूर किताब 'वांडरिंग्स ऑफ ए पिलग्रिम इन सर्च ऑफ द पिक्चरेस्क' में 19वीं सदी के आगरा के जनजीवन का बहुत ही सजीव चित्रण किया है। उन्होंने ब्रिटिश कैंपों में होने वाली मेहमाननवाजी और चाय-कॉफी के दौर का भी जिक्र किया है। वह अपनी किताब में लिखती हैं कि लंबी यात्राओं के दौरान तंबू लगाकर जब अंग्रेज अधिकारी रुकते थे, तो भारतीय नौकर जिस तरह से विपरीत परिस्थितियों में भी केतली में पानी उबालकर उत्तम चाय तैयार करते थे, वह बेहद सराहनीय था।

 

एक अन्य अंग्रेज लेखिका फ्लोरा एनी स्टील ने 1888 में 'द कम्प्लीट इंडियन हाउसकीपर एंड कुक' नामक एक किताब लिखी थी। यह किताब उस समय आगरा, मेरठ और लखनऊ जैसी जगहों पर रहने वाली हर ब्रिटिश महिला (मेमसाहब) के लिए एक गाइडबुक की तरह थी। इस किताब में बाकायदा ये नियम लिखे गए थे कि भारतीय खानसामों (रसोइयों) से अच्छी चाय कैसे बनवानी है। इसमें लिखा था कि चाय की पत्ती को पानी में कभी नहीं उबालना चाहिए, बल्कि उबलते हुए पानी को चायपत्ती पर डालना चाहिए। अंग्रेज महिलाओं को आगरा की गर्मी और धूल के बीच अपने ड्राइंग रूम में आफ्टरनून टी (दोपहर की चाय) आयोजित करने का बहुत शौक था, जो उनके लिए एक बड़ा सामाजिक आयोजन होता था।

 
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जंगल बुक के मशहूर ब्रिटिश लेखक रुडयार्ड किपलिंग की कई कहानियों, कविताओं और एंग्लो-इंडियन संस्मरणों में छोटा हाजिरी का बार-बार जिक्र आता है। किपलिंग के साहित्य में इसे एक ऐसी रस्म के तौर पर दिखाया गया है, जिसके बिना किसी भी ब्रिटिश अधिकारी के दिन की शुरुआत नहीं हो सकती थी।

बोन चाइना के बर्तन और चांदी की ट्रे में परोसी जाती थी छोटा हाजिरी
छोटा हाजिरी केवल चाय पीने तक सीमित नहीं था, बल्कि यह ब्रिटिश मेहमाननवाजी और रुतबे का प्रदर्शन भी था। भारतीय खानसामों (रसोइयों) के लिए सख्त हिदायत होती थी कि छोटा हाजिरी हमेशा बोन चाइना के महंगे बर्तनों और चमकती हुई चांदी की ट्रे में परोसी जाए। इसके मेनू में आमतौर पर असम या दार्जिलिंग की प्रीमियम चाय के साथ टोस्ट, थोड़ा सा मक्खन और कभी-कभी पपीता या केला होता था।

...और ब्रिटिश डिक्शनरी का हिस्सा भी बना छोटा हाजिरी
सबसे दिलचस्प बात यह है कि अंग्रेजों ने इस परंपरा की शुरुआत तो कर दी थी, लेकिन 'छोटा हाजिरी' नाम अंग्रेजों ने नहीं, बल्कि उनके भारतीय नौकरों ने दिया था। अंग्रेज अपनी भाषा में इसे अर्ली मॉर्निंग टी ही कहते थे, लेकिन उनके भारतीय रसोइयों और बैरों ने देखा कि साहब लोग हाजिरी (परेड या दफ्तर में उपस्थिति) पर जाने से पहले यह थोड़ा सा (छोटा) नाश्ता करते हैं और फिर दोपहर में 'बड़ा' नाश्ता करते हैं। स्थानीय हिंदुस्तानी बोली से निकले इस शब्द को बाद में अंग्रेजों ने भी इतनी खुशी से अपना लिया कि यह ब्रिटिश डिक्शनरी का हिस्सा बन गया।
 

अरे हुजूर, वाह ताज बोलिए
आगरा में चाय नहीं उगाई जाती, लेकिन भारत में चाय की ब्रांडिंग का सबसे प्रतिष्ठित चेहरा आगरा का ताजमहल ही रहा है। 1966 में एक कंपनी ने जब अपनी सबसे प्रीमियम चाय को बाजार में उतारा, तो गुणवत्ता और रॉयल्टी का अहसास कराने के लिए उन्होंने इसे ताजमहल का नाम दिया। उस्ताद जाकिर हुसैन की उंगलियों की थाप और 'वाह ताज' के स्लोगन ने भारतीय चाय को हमेशा के लिए आगरा की इस ऐतिहासिक इमारत की भव्यता के साथ जोड़ दिया।

चाय से जुड़ी ये बातें क्या आप जानते हैं
1. सभी चाय एक ही पौधे से बनती हैं यह एक आम गलतफहमी है कि ब्लैक, ग्रीन, व्हाइट और ओलोंग चाय अलग-अलग पौधों से आती हैं, लेकिन सच्चाई यह है कि सभी असली चाय एक ही पौधे से बनती हैं, जिसका नाम कैमेलिया साइनेन्सिस है। इनका रंग और स्वाद सिर्फ इस बात पर निर्भर करता है कि पत्तियों को तोड़ने के बाद उन्हें किस तरह सुखाया और फरमेंट (ऑक्सीकरण) किया गया है।

2. गलती से हुआ टी-बैग का आविष्कार टी-बैग बनाने का कोई पूर्व-नियोजित विचार नहीं था। वर्ष 1908 में अमेरिकी चाय व्यापारी थॉमस सुलिवन ने अपने ग्राहकों को सैंपल भेजने के लिए चायपत्ती को छोटे रेशमी पाउच में बांधकर भेजा। ग्राहकों को लगा कि पाउच के साथ ही चाय बनानी है और उन्होंने उसे सीधे गर्म पानी में डाल दिया। इस तरह अनजाने में टी-बैग का जन्म हुआ।

3. चाय का शैंपेन: दार्जिलिंग टी दार्जिलिंग चाय को पूरी दुनिया में चाय का शैंपेन कहा जाता है। यह भारत का पहला ऐसा उत्पाद था जिसे साल 2004 में भौगोलिक संकेत (जीआई टैग) प्रदान किया गया था, जो इसकी विशिष्टता को प्रमाणित करता है।

4. खोज की रोचक कहानी चाय की खोज का श्रेय चीन के सम्राट शेंग नुंग को जाता है। माना जाता है कि 2737 ईसा पूर्व में, वह गर्म पानी पी रहे थे, तभी एक जंगली चाय के पौधे की कुछ पत्तियां हवा से उड़कर उनके प्याले में गिर गईं। पानी का रंग बदला और एक बेहतरीन खुशबू आई, और इसी के साथ दुनिया को चाय मिल गई।
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