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UP: मासूम जेनी की शरारतों में छिपी है दर्द की दास्तां, नन्ही भालू शावक की ऐसी कहानी; जो रुला देगी
भूपेंद्र कुमार, अमर उजाला न्यूज नेटवर्क, आगरा
Published by: Dhirendra Singh
Updated Tue, 10 Mar 2026 12:27 PM IST
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सार
मध्य प्रदेश के शहडोल में ग्रामीणों के हमले में मां को खोने वाली नन्ही भालू शावक जेनी को आगरा के भालू संरक्षण केंद्र में नई जिंदगी मिल रही है। वाइल्डलाइफ एसओएस की देखरेख में अब जेनी स्वस्थ हो रही है और अपनी मासूम शरारतों से सबका दिल जीत रही है।
नन्ही भालू शावक जेनी
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
उसकी मासूम शरारतों को देखकर आप कभी नहीं जान पाएंगे उसने क्या खोया है। जिंदगी हर किसी पर मेहरबान नहीं होती। जेनी की कहानी भी ऐसी ही है। अपनी मां के साथ-साथ उसने वह सब खो दिया जिसे बचपन कहते हैं। ...और वह बसेरा भी जहां के हरे-भरे जंगलों में उसने जन्म लिया। आगरा के भालू संरक्षण केंद्र में एक साल की मादा स्लाॅथ भालू जेनी की प्यारी शरारतें देखकर आपको खुशनुमा-सा अहसास होगा। पर इस खुशी के पीछे के दर्द की कहानी से आपका दिल टूट जाएगा।
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मध्य प्रदेश के शहडोल के जंगलों में बड़ी तादाद में भालू रहते हैं। इन्हीं में से थी जेनी और उसकी मां। जेनी महज पांच माह की थी जब उसकी मां उसे लेकर पास के गांव में खाने की तलाश में गई थी। भालू अमूमन महुए या फलों की तलाश में गांवों का रुख करते हैं। वह दिन नन्ही जेनी को जीवनभर का दुख दे गया। जेनी की मां पर गांववालों ने हमला कर दिया। पत्थरों की बरसात कर दी। इस हमले में जेनी की मां को गंभीर चोट लगी। जब जंगल से किसी नन्हे भालू के रोने की आवाज आई तो कुछ ग्रामीणों ने घटना के बारे में वन विभाग को बताया।
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विभाग की टीम को जेनी और उसकी मां बुरी हालत में मिले। काफी प्रयासों के बाद भी जेनी की मां को बचाया नहीं जा सका। मानव और वन्य जीव के बीच संघर्ष की इस घटना को भी भुला दिया जाता अगर नन्ही जेनी की जान बचाने के लिए वन विभाग ने स्वयंसेवी संगठन वाइल्ड लाइफ एसओएस से संपर्क नहीं किया होता। जेनी की हालत खराब थी, उसे पाचन संबंधी गंभीर दिक्कतें हो गई थीं। वन विभाग के अधिकारियों को अहसास था कि जेनी किसी भी हालत में जंगल में नहीं बच सकेगी।
जेनी को आगरा के कीठम में भालू संरक्षण केंद्र भेजा गया, जिसे वाइल्डलाइफ एसओएस की टीम चलाती है। यहां जेनी को वीनिंग यूनिट में भर्ती कराया गया। पशु चिकित्सकों की टीम ने उसे बेहतर इलाज दिया जिससे धीरे-धीरे वह बेहतर होने लगी। इस भालू शावक का नाम प्रसिद्ध अभिनेत्री जेनिफर विंगेट के नाम पर रखा गया है, जो वन्य जीव संरक्षण से जुडी हैं। हालत में सुधार हुआ तो जेनी को बड़े से बाड़े में शिफ्ट किया गया। बाड़े में वह अकेले ही टायर और अपने दूसरे खिलौनों से खेलती रहती है। संस्था के सह संस्थापक और सीईओ कार्तिक सत्यनारायण कहते हैं, जेनी ने कम उम्र में बहुत बड़ा आघात झेला है, उसका यह दूसरा जीवन है। सह संस्थापक और सचिव गीता शेषमणि कहती हैं, हमारा प्रयास उसे वह सब कुछ देने का है जो उसने खोया है। जेनी को जून, 2025 में यहां लाया गया था।
जेनी उदाहरण है मानव और वन्य जीवों के संघर्ष का। जंगलों को जब कृषि योग्य बनाया गया तो भालुओं के प्राकृतिक बसेरे नष्ट होने लगे। जंगल घटे तो भालू खाने की तलाश में मानव बस्तियों की ओर रुख करने लगे। यहीं से संघर्ष शुरू हुआ। आंकड़ों के अनुसार देशभर में भालुओं की संख्या 15 से 20 हजार के आसपास है, कभी यह संख्या लाखों में थी। बड़े पैमाने पर शिकार और तमाशे के लिए पकड़े जाने की वजह से इनकी संख्या में तेजी से गिरावट आई। भालू की औसत उम्र 20 से 30 वर्ष होती है पर कलंदरों या मदारियों के पास ये 8-10 साल ही मुश्किल से जी पाते हैं। ऐसे भालुओं के संरक्षण में वाइल्ड लाइफ एसओएस ने बेहतरीन काम किया है। आखिर यहीं तो नन्ही जेनी का दूसरा जन्म भी हुआ है।
