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विजय दिवस: जब पार्थिव शरीर देख पत्नी ने पूछा-कुछ किया भी या ऐसे ही मर गए, फिर सैन्यकर्मियों ने सुनाई वीर गाथा

अमर उजाला नेटवर्क, आगरा Published by: भूपेन्द्र सिंह Updated Thu, 25 Jul 2024 06:20 PM IST
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सार

आज पूरा कृतज्ञ राष्ट्र कारगिल में सर्वोच्च बलिदान देने वाले सपूतों को नमन कर रहा है। मां भारती के जांबाजों की शौर्य गाथा इतिहास में स्वर्णाक्षरों में अंकित हैं। ऐसा ही प्रेरक वाकया है कारगिल में बलिदान होने वाले वीर चक्र से सम्मानित बलिदानी हवलदार कुमार सिंह का। जब बलिदानी का पार्थिव शरीर आया तो उनकी पत्नी की प्रतिक्रिया ने एक पल के लिए सभी को हैरानी में डाल दिया था। उन्होंने पूछा था कि कुछ किया भी या ऐसे ही मर गए। तब शैन्यकर्मियों ने उनकी वीर गाथा सुनाई थी। 

Veer Chakra awarded Martyr Havildar Kumar Singh belong to Fatehpur Sikri in Agra also martyred in Kargil
वीर चक्र से सम्मानित बलिदानी हवलदार कुमार सिंह का स्मारक - फोटो : संवाद
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विस्तार

पूरा देश कारगिल विजय दिवस के अवसर पर युद्ध में बलिदानी जवानों को याद कर रहा है। इसी कड़ी में देश के लिए अपने प्राण न्योछावर करने वाले आगरा के फतेहपुर सीकरी के रहने वाले रणबांकुरे वीर चक्र से सम्मानित बलिदानी हवलदार कुमार सिंह को याद कर रहे हैं। 

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जाट रेजीमेंट के जाबांज रणबांकुरे बलिदानी कुमार सिंह 40 वर्ष की आयु में बलिदान हो गए। उन्होंने द्रास सेक्टर मश्कोह घाटी में थ्री पिंपल्स चोटी को मुक्त कराते हुए अपने प्राण न्योछावर कर दिए। जब उनका पार्थिव शरीर उनके बसेरी काजी गांव पहुंचा था, तो उनकी पत्नी बलवीरी ने सैन्य अधिकारियों से यह पूछ कर हैरान कर दिया था कि 'उन्होंने कुछ किया भी था... या ऐसे ही मर गए'। अपने पति के बलिदान से पत्नी बलवीरी गौरवान्वित थी। जब सैन्य अधिकारियों ने उनकी वीरता की गाथा बताई तो उनका सीना फक्र से चौड़ा हो गया।

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पार्थिव शरीर लेकर आए सैन्य अधिकारी टीकम सिंह ने बताया था कि चार जुलाई को 18 हजार फीट ऊंची थ्री पिंपल्स चोटी को मुक्त कराने का आदेश उनकी बटालियन को मिला था। उस पर आक्रमण के लिए 10 घंटे की दुर्गम चढ़ाई के बाद उनकी बटालियन ने चोटी पर पहुंचकर गड्ढे खोदे। वहां बंकर बनाकर कई घंटे गुजारे। बताया कि पांच जुलाई की रात करीब 8 बजे उनकी बटालियन ने घुसपैठियों पर धावा बोल दिया। इसके जवाब में दूसरी तरफ से भी भारी गोलाबारी प्रारंभ हो गई। 
 

बताया कि कुछ समय के बाद मात्र 20 गज की दूरी से आमने-सामने की गोलाबारी प्रारंभ हो गई। इतनी करीबी लड़ाई के बाद भारतीय सेना का मोर्चे पर कब्जा हो गया। किंतु इस लड़ाई के दौरान बंकर में छिपे बैठे एक घुसपैठिये ने कुमार सिंह पर ताबड़तोड़ गोलियां बरसाईं। इस तरह वह मां भारती के लिए बलिदान हो गए। बताया था कि तीन घंटे की इस कार्रवाई में भारतीय सेना के 10 जवान शहीद हुए। जबकि, 50 घुसपैठिये मारे गए थे। 

बताया था कि उनके पास से पाक सैनिकों के परिचय पत्र तीन AK-47 राइफल, चार राइफल, आठ आरपीजी भारी मात्रा में कारतूस एवं गोला बारूद बरामद हुए थे। बलिदानी को मरणोपरांत वीर चक्र से सम्मानित किया गया था। उनके पुत्र सतेंद्र कुमार ने बताया कि हमने अपने पिता की याद में शहीद स्मारक गांव में जून 2021 में बनवाया है। इसका पूरा खर्च भी खुद ही वहन किया है। 
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