Antibiotics: एएमयू शोधकर्ताओं ने जताई पर्यावरणीय चिंता, पानी में घुली एंटीबायोटिक ने बिगाड़ी मछलियों की सेहत
शोधकर्ताओं ने सात दिनों तक सिंघी मछलियों को नॉरफ्लॉक्सासिन की चार अलग-अलग मात्राओं—0.0025, 0.1, 4 और 160 मिलीग्राम प्रति लीटर के संपर्क में रखा। इसके बाद मछलियों के रक्त, लीवर, प्रतिरक्षा तंत्र और शरीर के अन्य जैव-रासायनिक मानकों की विस्तृत जांच की गई।
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हम जिन एंटीबायोटिक दवाओं का इस्तेमाल अपने और पशुओं के इलाज के लिए करते हैं, उनके अवशेष अब नदियों और तालाबों तक पहुंचकर जलीय जीवन के लिए खतरा बन रहे हैं। एएमयू के प्राणी विज्ञान विभाग के शोधकर्ताओं के अध्ययन में खुलासा हुआ है कि व्यापक रूप से इस्तेमाल होने वाली एंटीबायोटिक नॉरफ्लॉक्सासिन मछली (सिंघी) के स्वास्थ्य पर गंभीर दुष्प्रभाव डाल सकती है।
शोधकर्ताओं ने सात दिनों तक सिंघी मछलियों को नॉरफ्लॉक्सासिन की चार अलग-अलग मात्राओं—0.0025, 0.1, 4 और 160 मिलीग्राम प्रति लीटर के संपर्क में रखा। इसके बाद मछलियों के रक्त, लीवर, प्रतिरक्षा तंत्र और शरीर के अन्य जैव-रासायनिक मानकों की विस्तृत जांच की गई। अध्ययन में पाया गया कि अधिक मात्रा में दवा के संपर्क में आने वाली मछलियों के लाल और सफेद रक्त कणिकाओं की संख्या में बदलाव आया। हीमोग्लोबिन का स्तर प्रभावित हुआ और रक्त की ऑक्सीजन पहुंचाने की क्षमता कम हुई। इससे मछलियों की वृद्धि, ऊर्जा और जीवित रहने की क्षमता पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है।
लीवर और किडनी पर भी पड़ा दबाव
जांच में एएसटी, एएलटी, एएलपी, एलडीएच जैसे महत्वपूर्ण एंजाइमों के स्तरों में असामान्य परिवर्तन पाए गए, जो लीवर पर पड़ने वाले तनाव का संकेत हैं। इसके अलावा कोलेस्ट्रॉल, ट्राइग्लिसराइड, ग्लूकोज, प्रोटीन, बिलीरुबिन और क्रिएटिनिन के स्तरों में भी बदलाव देखा गया, जिससे यह स्पष्ट हुआ कि शरीर का सामान्य चयापचय तंत्र प्रभावित हो रहा है। सूक्ष्म परीक्षण में लाल रक्त कोशिकाओं की झिल्ली और नाभिक में टूट-फूट, कोशिकाओं का विकृत होना और उनमें रिक्त स्थान बनना जैसी गंभीर समस्याएं सामने आईं। प्लीहा में मौजूद प्रतिरक्षा कोशिकाओं की संख्या और संरचना में भी परिवर्तन पाए गए, जो रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होने की ओर इशारा करते हैं।
कम मात्रा में कम नुकसान
वैज्ञानिकों ने पाया कि 0.0025 मिलीग्राम प्रति लीटर की सबसे कम मात्रा पर मछलियों में बहुत कम प्रभाव दिखाई दिए। इससे स्पष्ट होता है कि दवा की सांद्रता बढ़ने के साथ उसका विषैला प्रभाव भी तेजी से बढ़ता है। अगर एंटीबायोटिक दवाओं के उपयोग और अपशिष्ट जल के निस्तारण पर नियंत्रण नहीं किया गया, तो जलीय पारिस्थितिकी तंत्र को गंभीर नुकसान पहुंच सकता है। इसका असर केवल मछलियों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि खाद्य शृंखला के माध्यम से मानव स्वास्थ्य भी प्रभावित हो सकता है। इस पर डॉ. हुमा वसीम, चांदनी, अब्दुर रऊफ समीम की रिपोर्ट अंतरराष्ट्रीय जर्नल स्प्रिंग नेचर में छपी है।
क्या कहते हैं विशेषज्ञ
विशेषज्ञ डॉ. हुमा वसीम के अनुसार, एंटीबायोटिक दवाओं का जिम्मेदारीपूर्ण उपयोग, अस्पतालों और पशुपालन इकाइयों के अपशिष्ट जल का वैज्ञानिक उपचार और जल स्रोतों की नियमित निगरानी समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। तभी जलीय जैव विविधता और पर्यावरण को सुरक्षित रखा जा सकेगा।