Asha Bhosle: अधूरी रह गई अलीगढ़ आने की हसरत, शहरयार की गजल 'दिल चीज क्या है...' को दी थी अमर आवाज
दिग्गज गायिका आशा भोसले का रविवार 12 अप्रैल को 92 वर्ष की आयु में निधन हो गया। एएमयू के उर्दू विभाग के प्रोफेसर शहरयार की गजलों को फिल्म उमराव जान में आशा भोंसले ने आवाज देकर अमर पहचान दी थी।
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पार्श्व गायिका आशा भोंसले अब दुनिया में नहीं रहीं। वह अलीगढ़ आना चाहती थीं, लेकिन उनकी हसरत अधूरी रह गई। उनके दुनिया में नहीं रहने से एक बार फिर अलीगढ़ का नाम सुर्खियों में है, क्योंकि एएमयू के उर्दू विभाग के प्रोफेसर शहरयार की गजलों को फिल्म उमराव जान में आशा भोंसले ने आवाज देकर अमर पहचान दी थी। शहरयार की गजलों ने हिंदी सिनेमा में भी अपनी अमिट छाप छोड़ी है। फिल्म में “दिल चीज क्या है…”, “इन आंखों की मस्ती के मस्ताने हजारों हैं” और “जुस्तजू जिसकी थी…” जैसी गजलों ने श्रोताओं के दिलों में खास जगह बनाई।
काश अलीगढ़ आ पातीं आशा
एएमयू के पूर्व जनसंपर्क अधिकारी डॉ. राहत अबरार ने कहा कि शहरयार की गजलों को जब उमराव जान में आशा भोंसले ने आवाज दी, तो वह दुनियाभर में मशहूर हो गईं। शहरयार अक्सर मुंबई जाते थे। रिकॉर्डिंग में उनकी मुलाकात आशा भोंसले से होती थी। वह बताते थे कि आशा भोंसले अलीगढ़ आना चाहती थीं, लेकिन उनकी ख्वाहिश पूरी नहीं हो सकी। उन्होंने कहा कि शहरयार की शोहरत उमराव जान की गजलाें से है। इसमें आशा भोंसले की आवाज का अहम योगदान है।
आशा ने मंगवाई थी हाथरस की हींग
गीतकार और संगीतकार कुमार चंद्रहास ने बताया कि आशा भोंसले से पहली बार वर्ष 1985 में फेमस ताड़देव स्टूडियो मुंबई में भेंट हुई थी, जहां वह उनके मित्र विशाल भारद्वाज के एक गीत की रिकॉर्डिंग में आई थीं। उन्होंने हाथरस की शुद्ध हींग भी मंगवाई थी। मुंबई में प्रभु कुंज पैडर रोड स्थित उनके निवास पर अलीगढ़ की कुछ प्रसिद्ध चीजें देने गया था। वर्ष 2017 में उनका लिखा और संगीतबद्ध किया हुआ एक गीत आशा भोंसले ने स्टूडियो ऑडियो क्राफ्ट अंधेरी में गाया था।
चंद्रहास ने कहा कि जब उन्होंने गाने से पहले गीत पढ़ा तो बोलीं कि इतनी शुद्ध और रस भरी हिंदी तो कवि प्रदीप और पंडित नरेंद्र शर्मा लिखा करते थे। आज तुम भी वैसा ही लिख रहे हो। यह बात मेरे लिए आज भी अत्यंत ही सुखद है। एक बार दुबई से उन्होंने फोन करके हाथरस की हींग के लिए मुझसे कहा था। फिर जब मैं मुंबई गया तो उनके लिए लेकर गया और वह बहुत प्रसन्न हुईं थीं। आशा भोंसले के निधन से संगीत जगत में उपजा शून्य शायद ही भरा जा सकेगा।
गजल को बनाया बनाया अमर
एएमयू में शहरयार के साथी साहित्य एकेडमी अवार्ड से सम्मानित प्रो. शाफे किदवई ने कहा कि यूं तो आशा भोंसले पाश्चात्य संस्कृति पर आधारित गीतों को आवाज देती थी, लेकिन पहली बार शहरयार की गजलों को उन्होंने आवाज देकर उसे अमर बना दिया। प्रो. शाफे किदवई ने कहा कि “शहरयार ने एक बार बताया था कि आशा भोंसले ने कहा था कि आपकी गजलों से उन्हें एक पहचान मिली है”।
जिक्र होते ही खिल जाते थे शहरयार
शहरयार के अभिन्न मित्रों में से एक डॉ. प्रेम कुमार ने कहा कि “अचानक मैं पूछ बैठा था उमराव जान की काबिले जिक्र और काबिले तारीफ की कामयाबी की वजह आप क्या मानते हैं। हमेशा की तरह उमराव जान का जिक्र आते ही वह खुश होते दिखने लगे। अजीब का एक संकोच, खूबसूरत सा एक गर्व, आंखों में चमक, चेहरा खिला-खिला, रोम-रोम में खुशी, तृप्ति प्रकट होने को मचलती थी। उनकी गजलों को आशा भोंसले की दमदार और शानदार आवाज की बदौलत खूब प्रसिद्धि मिली।
दिल में है जिंदा मखमली आवाज
शायर जॉनी फाॅस्टर ने कहा कि आशा भोंसले की आवाज हमारे दिल-ओ-दिमाग में आज तक जिंदा है। उनका नाम उनकी मखमली आवाज के लिए इतिहास में हमेशा के लिए दर्ज हो चुका है। खास तौर पर उमराव जान में गाई हर गजल ने उनको खास प्रसिद्धि दिलाई। अलीगढ़ का महत्व इस बात से बढ़ जाता है कि ये सारी गजलें शहरयार की कलम से निकलीं थीं।