Dolphin: गंगा में डॉल्फिन की गणना पूरी, दोगुना से अधिक हुई संख्या, अलीगढ़ में दिखीं आठ
डॉल्फिन की गणना के लिए इस बार हाइड्रोफोन तकनीक का इस्तेमाल किया गया। यह पानी के भीतर काम करने वाला विशेष माइक्रोफोन होता है, जो डॉल्फिन द्वारा निकाली जाने वाली इकोलोकेशन अल्ट्रासोनिक ध्वनियों को रिकॉर्ड करता है। इसी आधार पर उनकी मौजूदगी और संख्या का अनुमान लगाया जाता है।
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गंगा में बढ़ती डॉल्फिन ने एक बार फिर संकेत दिया है कि नदी का पारिस्थितिक तंत्र धीरे-धीरे बेहतर हो रहा है। बीते पांच माह से बिजनौर से कासगंज तक करीब 200 किलोमीटर दायरे में जारी गंगा डॉल्फिन गणना पूरी हो चुकी है। सर्वे के दौरान बुलंदशहर के नरौरा से कासगंज के नदरई पुल तक 32 डॉल्फिन दिखाई दीं, जबकि अलीगढ़ में 17 किलोमीटर दायरे में बहने वाली गंगा में आठ डॉल्फिन की मौजूदगी दर्ज की गई है। अब इसकी विस्तृत रिपोर्ट भारतीय वन्यजीव संस्थान (डब्ल्यूआईआई) देहरादून की ओर से जारी की जाएगी।
यह गणना बिजनौर के दारानगर गंज से गढ़मुक्तेश्वर, अनूपशहर, कर्णवास, राजघाट, नरौरा, ब्रज घाट, अलीगढ़ और कछला घाट तक की गई। डब्ल्यूडब्ल्यूएफ के प्रतिनिधि हरिमोहन मीणा ने बताया कि जनवरी से शुरू हुई यह गणना अब पूरी हो चुकी है। अंतिम रिपोर्ट आने के बाद डॉल्फिन की वास्तविक संख्या और उनके मूवमेंट पैटर्न की स्पष्ट जानकारी सामने आएगी।
आईआईटी कानपुर की शोध टीम के साथ चूमने पर नरौरा से नदरई पुल कासगंज तक 31 डॉल्फिन देखी गईं थीं। इस समय अलीगढ़ के सांकरा में डॉल्फिन देखी गईं।- ज्ञानेश शर्मा, सदस्य, नमामि गंगे।
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गंगा आरती और अन्य आयोजनों के दौरान जाने पर 20 साल पहले तक खूब डॉल्फिन देखीं जाती थीं, बीच में इनकी संख्या बहुत कम हो गई थी, अब इनकी संख्या धीरे-धीरे बढ़ रही है। वर्तमान में अलीगढ़ में आठ डॉल्फिन हैं।- सुनील कौशल महाराज, अलीगढ़
नौ साल में दोगुना से ज्यादा हुई संख्या
आंकड़े बताते हैं कि वर्ष 2015 तक इन इलाकों में गंगा डॉल्फिन की संख्या महज 22 थी। वर्ष 2016 में यह बढ़कर 30 तक पहुंची और इसके बाद लगातार वृद्धि दर्ज की जा रही है। वर्ष 2024 में हुई पिछली गणना में इनकी संख्या 52 दर्ज की गई थी। यानी 2015 से 2024 के बीच गंगा डॉल्फिन की संख्या दोगुना से अधिक हो चुकी है। विशेषज्ञ इसे गंगा के जलस्तर, प्रवाह और स्वच्छता में सुधार का सकारात्मक संकेत मान रहे हैं।
पानी के भीतर ध्वनि पकड़कर हुई गिनती
डॉल्फिन की गणना के लिए इस बार हाइड्रोफोन तकनीक का इस्तेमाल किया गया। यह पानी के भीतर काम करने वाला विशेष माइक्रोफोन होता है, जो डॉल्फिन द्वारा निकाली जाने वाली इकोलोकेशन अल्ट्रासोनिक ध्वनियों को रिकॉर्ड करता है। इसी आधार पर उनकी मौजूदगी और संख्या का अनुमान लगाया जाता है। विशेषज्ञों के मुताबिक गंगा डॉल्फिन लगातार ध्वनि तरंगें छोड़ती हैं और उन्हीं की प्रतिध्वनि से रास्ता, शिकार और आसपास की गतिविधियों का पता लगाती हैं। यही वजह है कि वैज्ञानिक सर्वे में अब ध्वनि आधारित तकनीक को अधिक विश्वसनीय मानते हैं।
स्वच्छ जल की सबसे बड़ी पहचान
अलीगढ़ वन विभाग के रेंजर गौरव सिंह ने बताया कि गंगा में डॉल्फिन की बढ़ती संख्या बहुत बड़ी पर्यावरणीय सफलता है। यह स्तनधारी जीव केवल मीठे और अपेक्षाकृत स्वच्छ जल में ही जीवित रह पाता है। गंगा डॉल्फिन को केंद्र सरकार ने 18 मई 2009 को देश का राष्ट्रीय जलीय जीव घोषित किया था। उन्होंने बताया कि यह एक नेत्रहीन जलीय जीव है, जिसकी सूंघने और ध्वनि पहचानने की क्षमता बेहद तेज होती है। यह मांसाहारी जीव है और छोटी मछलियों समेत जलीय जीवों को भोजन बनाती है। इसकी औसत आयु करीब 28 वर्ष तक दर्ज की गई है तथा मादा की लंबाई सामान्यत: नर से अधिक होती है।
सीमित क्षेत्रों में ही बचीं हैं डॉल्फिन
विशेषज्ञों के अनुसार उत्तर प्रदेश में नरौरा क्षेत्र और बिहार में पटना साहिब से भागलपुर-सुल्तानगंज तक का इलाका गंगा डॉल्फिन का प्रमुख आवास बचा है। स्थानीय भाषा में इसे ‘सोंस’ जबकि असम में ‘शिहू’ कहा जाता है। पर्यावरणविदों का मानना है कि यदि गंगा में प्रदूषण और अवैध बालू खनन पर नियंत्रण बना रहा तो आने वाले वर्षों में डॉल्फिन की संख्या में और इजाफा हो सकता है। वहीं वैज्ञानिक इसे गंगा के पुनर्जीवन अभियान की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक मान रहे हैं।