गुलवीर का सिरसा: पहले था चोरों के गांव के नाम से बदनाम, अब है देश सेवा और खेल का सिरमौर, ऐसे आया बदलाव
चार दशक पहले सिरसा का नाम चोरी, डकैती की वजह से बदनाम था। समय बदला, सोच बदली और गांव की पहचान भी बदल गई। जो गांव कभी कानून तोड़ने वालों के लिए बदनाम था वहीं के युवा बड़ी संख्या में सेना में भर्ती होकर देश की सीमाओं की रक्षा कर रहे हैं।
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खेलों के क्षितिज पर स्काटलैंड के ग्लासगो में 10 हजार मीटर दौड़ में गुलवीर सिंह रजत पदक जीतकर चांदी जैसे चमक उठे। गुलवीर का गांव सिरसा करीब चार दशक पहले तक चोरों के गढ़ के रूप में बदनाम था। इसकी पहचान घर-घर से फौज में जुड़कर गांव के युवाओं ने बदली। वर्तमान में फौजियों के गांव के रूप में प्रसिद्ध सिरसा गुलवीर के साथ खेलों में सिरमौर बनने की ओर बढ़ रहा है।
गांव के बुजुर्ग फौजी पदम सिंह बताते हैं कि चार दशक पहले सिरसा का नाम चोरी, डकैती की वजह से बदनाम था। समय बदला, सोच बदली और गांव की पहचान भी बदल गई। जो गांव कभी कानून तोड़ने वालों के लिए बदनाम था वहीं के युवा बड़ी संख्या में सेना में भर्ती होकर देश की सीमाओं की रक्षा कर रहे हैं। दावा है कि सिरसा अलीगढ़ का ऐसा गांव है जहां सबसे अधिक लोग सेना में हैं। जुगेंद्र सिंह और शिक्षक बनवारी लाल वशिष्ठ कहते हैं कि करीब छह हजार की आबादी वाले इस गांव के लगभग 300 जवान वर्तमान में सेना में सेवाएं दे रहे हैं जबकि करीब 200 सैनिक सेवानिवृत्त हो चुके हैं। लगभग हर परिवार का कोई न कोई सदस्य सेना से जुड़ा हुआ है।
अब इस गांव की नई पहचान अंतरराष्ट्रीय धावक गुलवीर सिंह हैं। ग्लासगो में रजत पदक जीतने के बाद गांव में उत्सव जैसा माहौल है। गुलवीर की सफलता ने सिरसा के युवाओं में यह विश्वास जगा दिया है कि मेहनत और लगन से गांव की मिट्टी से भी विश्व मंच तक पहुंचा जा सकता है। सिरसा अब केवल फौजियों का गढ़ ही नहीं बल्कि खेल प्रतिभाओं की नई नर्सरी बनने की ओर तेजी से बढ़ रहा है। गांव के किशोर-युवा सेना के साथ ट्रैक पर दौड़ने का भी सपना देख रहे हैं।
बेटे ने ट्रैक पर लहराया तिरंगा, पिता गांव में फहराना चाहते परचम
ग्लासगो में राष्ट्रमंडल खेलों में 10,000 मीटर दौड़ में रजत पदक जीतकर गुलवीर सिंह ने तिरंगा लहराया। वहीं उनके पिता पप्पू सिंह गांव में विकास का परचम फहराने की तैयारी कर रहे हैं। उन्होंने ग्राम प्रधान का चुनाव लड़ने की तैयारी की है। उन्होंने बताया कि गुलवीर की सफलता से पूरे गांव का मान बढ़ा है। अब वह गांव की मूलभूत समस्याओं को दूर कराने के लिए प्रधानी का चुनाव लड़ेंगे। गांव में आज भी कई रास्ते कच्चे हैं। गांव के छुइया नाले पर अब तक पुलिया नहीं बन सकी है। बरसात के दिनों में स्कूली बच्चों, किसानों और रोजमर्रा के काम से निकलने वाले लोगों को दिक्कत होती है। उन्होंने बताया कि ग्रामीणों ने कहा है कि जिस गांव ने देश को अंतरराष्ट्रीय स्तर का एथलीट दिया है वहां बुनियादी सुविधाओं का विकास भी प्राथमिकता पर होना चाहिए।
जिस मिट्टी ने चैंपियन दिया, वहीं तैयार हों नए सितारे
गांव सिरसा में गुलवीर सिंह के नाम पर स्टेडियम बनाने की मांग जोर पकड़ने लगी है। लोगों ने कहा कि जिस गांव की मिट्टी ने अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी तैयार किया, वहां आधुनिक खेल सुविधाएं विकसित कर नई प्रतिभाओं को अवसर दिया जाना चाहिए। लोगों ने बताया कि सरकारी जमीन उपलब्ध है, जहां गुलवीर सिंह स्टेडियम का निर्माण कराया जा सकता है। अगर यहां स्टेडियम बनता है तो न केवल सिरसा, बल्कि आसपास के रसैनी, हबीलपुर, छबीलपुर, छौगवां, विशनपुर, चंदौआ, रुनपुर, तरैंची, बिजौली और शफीपुर सहित कई गांवों के खिलाड़ियों को अभ्यास के लिए बेहतर सुविधा मिलेगी।
वर्तमान में खेल प्रतिभाओं को प्रशिक्षण के लिए दूर जाना पड़ता है। गांव में स्टेडियम बनने से युवाओं को अपने क्षेत्र में ही नियमित अभ्यास का अवसर मिलेगा और अधिक खिलाड़ी राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंच सकेंगे। गुलवीर सिंह आज पूरे क्षेत्र के युवाओं के लिए प्रेरणा बन चुके हैं। ऐसे में उनके नाम पर स्टेडियम का निर्माण न केवल उनकी उपलब्धियों का सम्मान होगा, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को खेलों के प्रति प्रेरित करने वाला स्थायी स्मारक भी साबित होगा।