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Aligarh News: अनिश्चित क्यों हुई आंधी-बारिश... 35 साल के डाटा से तलाश रहे जवाब
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एएमयू के भूगोल विभाग से बैलून छोड़ते प्रो. एवं अन्य शिक्षक।
- फोटो : samvad
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उत्तर प्रदेश समेत उत्तर भारत में मौसम के बदलते मिजाज को समझने के लिए वैज्ञानिक अब 1990 के दशक की आंधी, तूफान और बरसात के आंकड़ों की तुलना वर्तमान परिस्थितियों से कर रहे हैं।
इसरो के सहयोग से अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में चल रहे अध्ययन में पता लगाया जा रहा है कि बीते 35 वर्षों में पृथ्वी के बढ़ते तापमान ने गर्मी, बारिश, आंधी और नमी के पैटर्न को कितना बदला है। एएमयू के भूगोल विभाग में बैलून प्रोजेक्ट चल रहा है। जुलाई 2024 में शुरू हुए इस प्रोजेक्ट में अब तक 38 बैलून छोड़े जा चुके हैं, जो रेडियो सोंड के माध्यम से वायुमंडल के तापमान, हवा की रफ्तार, नमी और बारिश का ब्योरा भेजते हैं, जिसका भूगोल विभाग में अध्ययन होता है।
बैलून प्रोजेक्ट के प्रभारी भूगोल विभाग के प्रो.अतीक अहमद कहते हैं कि कारसेट, इनसेट और आईआरएस आदि मौसम के उपग्रहों से मिला डाटा 35 वर्ष पूर्व के मौसम का ब्योरा देता है। बीते चार दशक में वर्ष 2024 में सर्वाधिक गर्मी पड़ी है। इनका कहना है कि इसी बदलाव के कारण अब मौसम अधिक अनिश्चित और चरम होता जा रहा है।
इस अध्ययन के तहत मौसम संबंधी बैलून के जरिए 100 किमी के दायरे में वायुमंडल के तापमान, नमी, हवा की गति और वर्षा से जुड़ा डाटा जुटाया जा रहा है। इनसे मिले आंकड़ों की तुलना उपग्रहों से प्राप्त 35 वर्ष पुराने रिकॉर्ड से की जा रही है।
ईरान-इस्राइल युद्ध से बढ़ा कार्बन उत्सर्जन
प्रो. अतीक के मुताबिक, ईरान-इस्राइल युद्ध, लेबनान और यूएई के कई ठिकानों पर हुए हमलों से कार्बन उत्सर्जन बढ़ा है। युद्धों के साथ ही वाहनों का धुआं, वायु प्रदूषण और घटती हरियाली भी इसके बड़े कारण हैं। जिससे गर्मी बढ़ रही है। यही कारण है भूमध्य सागर में पश्चिमी विक्षोभ सक्रिय हुआ और मार्च और अप्रैल में बेमौसम की बारिश हुई है।
किसानों और आमजन को मिलेगा फायदा
अध्ययन से मिले निष्कर्षों के आधार पर मौसम का अधिक सटीक पूर्वानुमान तैयार किया जा रहा है, जिससे किसानों, आपदा प्रबंधन एजेंसियों और आम लोगों को पहले से अलर्ट किया जा सके। वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि कार्बन उत्सर्जन नियंत्रित नहीं हुआ तो भविष्य में सूखा, बाढ़ और चरम मौसम की घटनाएं और बढ़ सकती हैं।
अगर कार्बन उत्सर्जन नियंत्रित नहीं हुआ तो भविष्य में सूखा, बाढ़ और चरम मौसम की घटनाएं बढ़ेंगी। अध्ययन का उद्देश्य बदलते मौसम को समझकर बेहतर पूर्वानुमान देना है। - प्रो. अतीक अहमद, भूगोल विभाग, एएमयू
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इसरो के सहयोग से अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में चल रहे अध्ययन में पता लगाया जा रहा है कि बीते 35 वर्षों में पृथ्वी के बढ़ते तापमान ने गर्मी, बारिश, आंधी और नमी के पैटर्न को कितना बदला है। एएमयू के भूगोल विभाग में बैलून प्रोजेक्ट चल रहा है। जुलाई 2024 में शुरू हुए इस प्रोजेक्ट में अब तक 38 बैलून छोड़े जा चुके हैं, जो रेडियो सोंड के माध्यम से वायुमंडल के तापमान, हवा की रफ्तार, नमी और बारिश का ब्योरा भेजते हैं, जिसका भूगोल विभाग में अध्ययन होता है।
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बैलून प्रोजेक्ट के प्रभारी भूगोल विभाग के प्रो.अतीक अहमद कहते हैं कि कारसेट, इनसेट और आईआरएस आदि मौसम के उपग्रहों से मिला डाटा 35 वर्ष पूर्व के मौसम का ब्योरा देता है। बीते चार दशक में वर्ष 2024 में सर्वाधिक गर्मी पड़ी है। इनका कहना है कि इसी बदलाव के कारण अब मौसम अधिक अनिश्चित और चरम होता जा रहा है।
इस अध्ययन के तहत मौसम संबंधी बैलून के जरिए 100 किमी के दायरे में वायुमंडल के तापमान, नमी, हवा की गति और वर्षा से जुड़ा डाटा जुटाया जा रहा है। इनसे मिले आंकड़ों की तुलना उपग्रहों से प्राप्त 35 वर्ष पुराने रिकॉर्ड से की जा रही है।
ईरान-इस्राइल युद्ध से बढ़ा कार्बन उत्सर्जन
प्रो. अतीक के मुताबिक, ईरान-इस्राइल युद्ध, लेबनान और यूएई के कई ठिकानों पर हुए हमलों से कार्बन उत्सर्जन बढ़ा है। युद्धों के साथ ही वाहनों का धुआं, वायु प्रदूषण और घटती हरियाली भी इसके बड़े कारण हैं। जिससे गर्मी बढ़ रही है। यही कारण है भूमध्य सागर में पश्चिमी विक्षोभ सक्रिय हुआ और मार्च और अप्रैल में बेमौसम की बारिश हुई है।
किसानों और आमजन को मिलेगा फायदा
अध्ययन से मिले निष्कर्षों के आधार पर मौसम का अधिक सटीक पूर्वानुमान तैयार किया जा रहा है, जिससे किसानों, आपदा प्रबंधन एजेंसियों और आम लोगों को पहले से अलर्ट किया जा सके। वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि कार्बन उत्सर्जन नियंत्रित नहीं हुआ तो भविष्य में सूखा, बाढ़ और चरम मौसम की घटनाएं और बढ़ सकती हैं।
अगर कार्बन उत्सर्जन नियंत्रित नहीं हुआ तो भविष्य में सूखा, बाढ़ और चरम मौसम की घटनाएं बढ़ेंगी। अध्ययन का उद्देश्य बदलते मौसम को समझकर बेहतर पूर्वानुमान देना है। - प्रो. अतीक अहमद, भूगोल विभाग, एएमयू