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हाईकोर्ट सख्त : पत्नी को गुजारा भत्ता न देना सम्मान के साथ जीने के अधिकार का उल्लंघन, यह कोई उपकार या दान नहीं
Wed, 12 Aug 2026 07:15 PM IST
विनोद सिंह
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
Published by: विनोद सिंह
Updated Wed, 12 Aug 2026 07:15 PM IST
सार
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि गुजारा भत्ता कोई उपकार या दान नहीं, पत्नी का अधिकार है। इससे वंचित कर उसे गरीबी में छोड़ना अनुच्छेद-21 के तहत मिले सम्मान के साथ जीने के अधिकार के भी खिलाफ है।
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अदालत का फैसला।
- फोटो : अमर उजाला।
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विस्तार
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि गुजारा भत्ता कोई उपकार या दान नहीं, पत्नी का अधिकार है। इससे वंचित कर उसे गरीबी में छोड़ना अनुच्छेद-21 के तहत मिले सम्मान के साथ जीने के अधिकार के भी खिलाफ है। इस टिप्पणी संग न्यायमूर्ति अचल सचदेव की एकल पीठ ने परिवार न्यायालय के गुजारा भत्ता देने के खिलाफ दायर देवांश की पुनरीक्षण याचिका खारिज कर दी।
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गौतमबुद्ध नगर निवासी महिला ने परिवार न्यायालय में गुजारा भत्ता का वाद दायर किया था। आरोप लगाया था कि शादी के बाद दहेज की मांग को लेकर उसे प्रताड़ित किया गया। उसके साथ मारपीट की भी गई। वह अप्रैल 2018 से मायके में रह रही है और उसके पास आय का कोई स्वतंत्र स्रोत नहीं है।
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महिला ने पति की मासिक आय करीब 70 हजार रुपये बताते हुए 30 हजार रुपये प्रतिमाह गुजारा भत्ता मांगा था। कोर्ट ने पत्नी के पक्ष में फैसला सुनाते हुए पति को हर महीने उसे 20 हजार रुपये गुजारा भत्ता देने का आदेश दिया था। इस फैसले को चुनौती देते हुए पति ने हाईकोर्ट में पुनरीक्षण अर्जी दायर की थी।
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कोर्ट ने कहा कि पत्नी, नाबालिग बच्चे का भरण-पोषण करना पति का नैतिक कर्तव्य और सामाजिक जिम्मेदारी है। साथ ही सुप्रीम कोर्ट के भुवन मोहन सिंह बनाम मीना और चतुर्भुज बनाम सीताबाई फैसलों का भी हवाला दिया। कोर्ट ने कहा कि गुजारा भत्ता का उद्देश्य पत्नी को गरीबी, तंगी और बेबसी से बचाना है। परिवार न्यायालय के आदेश में कोई कानूनी या तथ्यात्मक त्रुटि न मिलने पर हाईकोर्ट ने उसमें हस्तक्षेप से इन्कार कर दिया।