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Allahabad High Court : हत्या के मामले में पिता-बेटे को नहीं मिली राहत, सजा बरकरार
Mon, 03 Aug 2026 04:12 PM IST
विनोद सिंह
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
Published by: विनोद सिंह
Updated Mon, 03 Aug 2026 04:12 PM IST
सार
इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने दो नाबालिग बहनों की हत्या के मामले में दोषी पिता और बेटे को कोई राहत देने से इन्कार कर उनकी आजीवन कारावास की सजा को बरकरार रखा है।
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अदालत।
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने दो नाबालिग बहनों की हत्या के मामले में दोषी पिता और बेटे को कोई राहत देने से इन्कार कर उनकी आजीवन कारावास की सजा को बरकरार रखा है। यह आदेश न्यायमूर्ति जेजे मुनीर और न्यायमूर्ति विनय कुमार द्विवेदी की खंडपीठ ने अमरोहा ट्रायल कोर्ट की ओर से वर्ष 2019 में सुनाए गए फैसले को सही ठहराते हुए राम प्रसाद और उसके बेटे चंद्रभान की आपराधिक अपील खारिज कर दी।
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अभियोजन के अनुसार, वर्ष 2016 में 13 वर्षीय दयावती और 11 वर्षीय धर्मवती की मौत को आत्महत्या बताने का प्रयास किया गया था। परिवार ने दावा किया कि दोनों ने आम के बाग में दुपट्टे से फांसी लगाकर जान दे दी, लेकिन पुलिस को सूचना देने के बजाय उनके शव दफना दिए गए।
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गांव के पूर्व प्रधान की शिकायत पर दर्ज एफआईआर के बाद जिला प्रशासन की अनुमति से शवों को कब्र से निकालकर पोस्टमार्टम कराया गया। जांच में स्पष्ट हुआ कि दोनों बच्चियों की मौत गला घोंटने से हुई थी। उनके शरीर पर कई चोटों के निशान थे। ट्रायल कोर्ट ने आजीवन कारावास की सजा सुनाई। इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई।
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हाईकोर्ट ने पक्षों को सुनने के बाद कहा कि यदि वास्तव में आत्महत्या हुई होती तो परिवार पुलिस को तत्काल सूचना देता और कानूनी प्रक्रिया का पालन करता। इसके विपरीत, शवों को बिना सूचना दफनाना और साक्ष्य छिपाने का प्रयास अपराध को छिपाने की मंशा को दर्शाता है। अदालत ने भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 8 का हवाला देते हुए कहा कि आरोपियों का आचरण अत्यंत प्रासंगिक साक्ष्य है। न्यायालय ने माना कि परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की पूरी शृंखला केवल आरोपियों के अपराध की ओर संकेत करती है और ट्रायल कोर्ट का फैसला पूरी तरह कानूनसम्मत है, इसलिए दोषसिद्धि और आजीवन कारावास की सजा में हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं है।