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UP : गलत कानून का हवाला देकर मंजूर किया तलाक, हाईकोर्ट ने रद्द किया फैसला
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
Published by: विनोद सिंह
Updated Fri, 17 Apr 2026 01:59 PM IST
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सार
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने तलाक के एक मामले में परिवार न्यायालय के आदेश को निरस्त कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि परिवार न्यायालय ने अपने फैसले में ऐसे कानून का हवाला दिया।
इलाहाबाद हाईकोर्ट।
- फोटो : अमर उजाला।
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विस्तार
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने तलाक के एक मामले में परिवार न्यायालय के आदेश को निरस्त कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि परिवार न्यायालय ने अपने फैसले में ऐसे कानून का हवाला दिया, जो अस्तित्व में ही नहीं है। इसके साथ ही मामले को पुनः सुनवाई के लिए वापस परिवार न्यायालय भेजते हुए तीन माह में नया निर्णय लेने का निर्देश दिया गया है।
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यह आदेश न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति विवेक सरन की खंडपीठ ने पति हाफिज की याचिका पर दिया है। बांदा के प्रधान न्यायाधीश, परिवार न्यायालय ने 28 जनवरी 2026 के आदेश में हाफिज का पत्नी से तलाक मंजूर कर लिया था। इस आदेश को याची ने हाईकोर्ट में चुनौती दी।
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याची पति की ओर से दलील दी गई कि पत्नी ने तलाक की अर्जी मुस्लिम स्त्री विवाह विच्छेद अधिनियम, 1986 के तहत दाखिल की, जबकि ऐसा कोई कानून अस्तित्व में ही नहीं है। विवाह विच्छेद के लिए मुस्लिम विवाह विघटन अधिनियम, 1939 लागू होता है, जबकि 1986 का कानून तलाकशुदा मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों की सुरक्षा से संबंधित है, न कि विवाह विच्छेद से।
कोर्ट ने कहा कि केवल वादपत्र में गलत कानून लिख देने से फैसला अवैध नहीं होता। बशर्ते अदालत सही कानून के तहत निर्णय दे, लेकिन इस मामले में परिवार न्यायालय ने पूरे निर्णय में बार-बार उसी गैर-मौजूद कानून का उल्लेख किया और उसी के आधार पर राहत भी दे दी।
कोर्ट ने इसे गंभीर लापरवाही बताते हुए कहा कि एक वरिष्ठ न्यायाधीश से अपेक्षा होती है कि वह जिस कानून का उल्लेख कर रहे हैं, उसकी वैधता सुनिश्चित करें। कोर्ट ने 28 जनवरी 2026 का आदेश रद्द करते हुए मामले को परिवार न्यायालय को वापस भेज दिया है।
