High Court : कर्मचारी की बर्खास्तगी की वैधता से पहले विभागीय जांच की पवित्रता का परीक्षण जरूरी
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि कर्मचारी की बर्खास्तगी की वैधता से पहले विभागीय जांच की पवित्रता का परीक्षण जरूरी है। जांच में खोट मिलने पर नियोक्ता को बचाव का अवसर दिए बिना कर्मचारी को दोषमुक्त घोषित करना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत की अवहेलना है।
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि कर्मचारी की बर्खास्तगी की वैधता से पहले विभागीय जांच की पवित्रता का परीक्षण जरूरी है। जांच में खोट मिलने पर नियोक्ता को बचाव का अवसर दिए बिना कर्मचारी को दोषमुक्त घोषित करना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत की अवहेलना है।
इस टिप्पणी संग न्यायमूर्ति सौरभ श्याम शमशेरी की एकल पीठ ने मेसर्स शाही एक्सपोर्ट हाउस की याचिका आंशिक रूप से स्वीकार कर ली। साथ ही कर्मचारी के पक्ष में सुनाए गए नोएडा श्रम न्यायालय के निर्णय को आंशिक रूप से रद्द कर दिया। मामले को श्रम न्यायालय के पास भेजते हुए तीन महीने में नियोक्ता व कर्मचारी को सुनवाई व साक्ष्य प्रस्तुत करने का अवसर देते हुए नए सिरे से फैसला लेने का आदेश दिया है।
मामले में नियोक्ता ने कर्मचारी के खिलाफ लगे विभिन्न आरोपों पर विभागीय जांच कराई थी। रिपोर्ट के आधार पर अक्तूबर 2001 में कर्मचारी की सेवाएं समाप्त कर दी गईं। इसके खिलाफ कर्मचारी ने नोएडा श्रम न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। सुनवाई के दौरान श्रम न्यायालय ने सेवा समाप्ति के अलावा यह वाद बिंदु भी तय किया कि क्या विभागीय जांच निष्पक्ष थी।
हालांकि, इस मुद्दे का पहले निर्णय करने के बजाय श्रम न्यायालय ने आरोपों के गुण-दोष पर भी साथ-साथ साक्ष्य दर्ज कर लिए और अंततः यह निष्कर्ष निकाला कि विभागीय जांच निष्पक्ष नहीं थी। लिहाजा, कर्मचारी के खिलाफ लगाए गए आरोप भी सिद्ध नहीं हुए। इसके आधार पर बर्खास्तगी को अवैध घोषित कर दिया।
नियोक्ता ने इस निर्णय को हाईकोर्ट में चुनौती दी। सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला दिया। कहा कि श्रम न्यायालय ने सुनवाई की गलत प्रक्रिया अपनाई है। उसने विभागीय जांच की वैधता और आरोपों के गुण-दोष पर एक साथ निर्णय दिया, जबकि पहले केवल विभागीय जांच की निष्पक्षता पर निर्णय होना चाहिए था। यदि विभागीय जांच वैध पाई जाती है तो उसी के आधार पर बर्खास्तगी का निर्णय कायम रहेगा। लेकिन यदि जांच दोषपूर्ण या अनुचित पाई जाती है तो नियोक्ता को श्रम न्यायालय के समक्ष स्वतंत्र साक्ष्य प्रस्तुत कर आरोप सिद्ध करने का अवसर दिया जाना अनिवार्य है। उसके बाद ही श्रम न्यायालय बर्खास्तगी की वैधता पर निर्णय दे सकता है।
वहीं, कर्मचारी के अधिवक्ता ने श्रम न्यायालय के निर्णय को सही बताया। हलांकि, कोर्ट ने कहा कि यदि विभागीय जांच निष्पक्ष और विधिसम्मत पाई जाती है तो सामान्यतः नियोक्ता को अतिरिक्त साक्ष्य प्रस्तुत करने की आवश्यकता नहीं होती। सुप्रीम कोर्ट के वर्कमैन ऑफ मेसर्स फायरस्टोन टायर एंड रबर कंपनी ऑफ इंडिया (प्रा.) लिमिटेड के मामले में दिए फैसले का हवाला दिया। स्पष्ट किया कि विभागीय जांच की वैधता और निष्पक्षता का प्रश्न हमेशा प्रारंभिक मुद्दे के रूप में तय किया जाना चाहिए। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि श्रम न्यायालय का विभागीय जांच को अनुचित ठहराने वाला निष्कर्ष सही है। उसमें हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है, लेकिन आरोप सिद्ध न होने संबंधी निष्कर्ष कानून के विपरीत है।