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UP: हाईकोर्ट की तल्ख टिप्पणी- यूपी पुलिस के लिए संविधान से बड़ी राजनीतिक आकाओं की खुशी, यहां नहीं कानून का राज

अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Sun, 07 Jun 2026 02:46 AM IST
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सार

Allahabad High Court : इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि यूपी पुलिस के लिए संविधान नहीं, राजनीतिक आकाओं को खुशी बड़ी है। मलाईदार तैनाती के लिए उन्हें खुश करना ही उनका मकसद है।

High Court's harsh comment - For UP Police, the happiness of political masters is bigger than the Constitution
इलाहाबाद हाईकोर्ट - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि यूपी पुलिस के लिए संविधान नहीं, राजनीतिक आकाओं को खुशी बड़ी है। मलाईदार तैनाती के लिए उन्हें खुश करना ही उनका मकसद है। भले ही इसके लिए उन्हें किसी की अवैध गिरफ्तारी करनी पड़े या फर्जी मुठभेड़, वे करने से नहीं घबराते। उन्हें भरोसा है कि उन्हें उनके आका बचा लेंगे। यही कारण है कि यूपी में कानून का राज नहीं, बल्कि अफसरों की सनक और राजनीतिक आकाओं को खुश करने का खेल अपने चरम पर हैं।

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इस तल्ख टिप्पणी संग न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर की एकल पीठ ने गाजियाबाद के नंदग्राम थाने में एक ही परिवार के पिता - पुत्र और बहू के ख़िलाफ़ गैंगस्टर अधिनियम के तहत लंबित अपराधिक कार्यवाही रद्द कर दिया। कोर्ट ने पाया कि याची राजेंद्र त्यागी, उनके बेटे दीपक त्यागी और बहू ललिता त्यागी के खिलाफ जिन दो एफआईआर को आधार बनाकर गैंगस्टर एक्ट लगाया गया था, वे जमीन के लेन-देन और वित्तीय विवादों से संबंधित थीं। इसके आधार पर केवल धोखाधड़ी या जालसाजी का आरोप बन सकता था।

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इनके आधार पर उन्हें संगठित गिरोह का सदस्य नहीं माना जा सकता। इसके बावजूद पुलिस की इस कार्रवाई के कारण महिला को अवैध रूप से 80 दिन तक जेल में रहना पड़ा। कोर्ट ने कहा कि 35 वर्षीय गृहिणी ललिता त्यागी को एफआईआर दर्ज होने के अगले ही दिन गिरफ्तार कर लिया गया, जबकि उनके खिलाफ गिरफ्तारी को उचित ठहराने वाला कोई ठोस आधार अभिलेखों पर मौजूद नहीं था। लिहाजा, कोर्ट ने इस गिरफ्तारी को प्रथम दृष्टया अवैध, मनमाना और कानून के विपरीत बताया।

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प्रयागराज के आईजी की कार्यशैली पर सवाल

कोर्ट ने गाजियाबाद के तत्कालीन पुलिस आयुक्त और वर्तमान में प्रयागराज जोन के आईजी अजय कुमार मिश्रा की भूमिका पर भी टिप्पणी की। कहा कि उन्होंने अपने अधीनस्थ अधिकारियों पर पर्याप्त पर्यवेक्षण नहीं रखा और गैंगस्टर एक्ट की कार्यवाही को स्वीकृति देने में आवश्यक सावधानी नहीं बरती। इस लापरवाह कार्रवाई के कारण एक महिला को लगभग 80 दिन तक न्यायिक हिरासत में रहना पड़ा।इस पुलिस कार्रवाई से खफा कोर्ट ने अपने 31 पेज के फैसले में यूपी पुलिस और उनके बड़े अफसरों की कार्यसंस्कृति पर जमकर खिंचाई की। कोर्ट ने कहा अधिकारी वर्ग का एक बड़ा हिस्सा कानून के शासन को संवैधानिक दायित्व नहीं बल्कि अपनी प्रगति की राह में रोड़ा मानता है। राजनीतिक आकाओं को खुश करने की सनक में अधिकारी कानून का पालन नहीं करना चाहते। जब अदालत आदेश देती है तो उसका औपचारिक पालन करते है लेकिन सार रूप में वह उसे भी विफल कर देते है।

ठोको संस्कृति से कोर्ट नाराज

कोर्ट ने ठोको संस्कृति और चयनात्मक कार्रवाई पर भी उंगली उठाई है। दोटूक कहा है कि अफसरों की निष्पक्षता खत्म हो चुकी है और वे अपनी कुर्सियां बचाने के लिए लक्षित अभियोजन चला रहे हैं। जबकि, उन्हें याद रखना चाहिए कि पुलिस कमिश्नर और कप्तान के पद राजनेताओं की निजी दुश्मनी भुनाने या उनकी सहूलियत के साधन नहीं हैं।

बिकरू कांड पर कोर्ट ने की टिप्पणी

कोर्ट ने कहा को यह याद करना उचित है कि बिकरू हत्याकांड में पूरे ऑपरेशन की निगरानी का जिम्मा जिस पुलिस अधिकारी को सौंपा गया था, उसे विभागीय जांच के निष्कर्ष के आधार पर मात्र औपचारिक चेतावनी देकर छोड़ दिया गया। जबकि, घटना में गैंगस्टर और उसके साथियों को पकड़ने गई पुलिस टीम पर घात लगा कर हमला हुआ। बेरहमी से एक पुलिस उपाधीक्षक सहित आठ पुलिसकर्मियों की हत्या कर दी गई। इन सब को भुला कर जिम्मेदार अधिकारी को बचाने की सरकारी उदारता समझ पाने में अदालत असहज महसूस करती है। बड़े अफसरों के प्रति दिखाई जाने वाली यह अत्यधिक उदारता न्यायसंगत नहीं है। जब गंभीर से गंभीर लापरवाही पर भी बड़े अधिकारियों की जवाबदेही तय नहीं होती, तो उनमें यह भरोसा बैठ जाता है कि उनका कुछ नहीं बिगड़ेगा।

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