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High Court : केवल संदेह के आधार पर किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता, फैसले के खिलाफ अपील खारिज

अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Thu, 02 Apr 2026 05:32 PM IST
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सार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने लूट के बाद हत्या के मामले से बरी करने के आदेश के खिलाफ दाखिल अपील खारिज कर दी। कोर्ट ने सत्र अदालत के फैसले पर मुहर लगाते हुए कहा कि परिस्थितिजन्य साक्ष्य में घटनाओं की कड़ियां जुड़ना जरूरी है। इ

No one can be convicted on the basis of mere suspicion, appeal against the verdict dismissed
अदालत(सांकेतिक) - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने लूट के बाद हत्या के मामले से बरी करने के आदेश के खिलाफ दाखिल अपील खारिज कर दी। कोर्ट ने सत्र अदालत के फैसले पर मुहर लगाते हुए कहा कि परिस्थितिजन्य साक्ष्य में घटनाओं की कड़ियां जुड़ना जरूरी है। इसके अभाव में अभियोजन की कहानी संदेहास्पद हो जाती है। केवल संदेह के आधार पर किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।

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यह आदेश न्यायमूर्ति सलिल कुमार राय और न्यायमूर्ति देवेंद्र कुमार सिंह प्रथम की एकल पीठ ने बृजेश कुमार की ओर से दाखिल आपराधिक अपील पर दिया है। मामला गौतमबुद्ध नगर के नोएडा फेज-दो थाना क्षेत्र का है। 2012 में एक नहर के किनारे लोकेश नाम के व्यक्ति का शव मिला था। लापता लोकेश के शव मिलने के बाद एफआईआर दर्ज की गई। विवेचना के दौरान आरोप लगा कि नरेंद्र कुमार और उसके साथियों ने 1,20,000 लूटने के उद्देश्य से लोकेश की गला घोंटकर और पत्थर से वार कर हत्या कर दी। मृतक के परिजनों का दावा था कि उसे आखिरी बार आरोपियों के साथ देखा गया था।

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हालांकि, सत्र अदालत ने अभियोजन की कहानी को संदेहास्पद मानते हुए आरोपियों को बरी कर दिया था। उसके खिलाफ मृतक के परिजन ब्रजेश की ओर से इस फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया गया। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पाया कि आखिरी बार देखे जाने (लास्ट सीन) का दावा करने वाले गवाहों ने घटना के कई दिन बाद तक पुलिस को जानकारी नहीं दी, जिससे उनकी गवाही संदिग्ध हो गई। शव मिलने के चार दिन बाद एफ़आईआर दर्ज की गई, जिसका कोई वाजिब कारण नहीं बताया गया। कोर्ट ने इसे सोच-समझकर की गई कार्रवाई की संभावना माना।

इसके अलावा कोर्ट ने पुलिस की ओर से साक्ष्य संकलन में भी कई खामियां पाईं। कोर्ट ने पाया कि पुलिस ने बरामद कपड़ों और पत्थर को फॉरेंसिक जांच के लिए नहीं भेजा। इससे यह साबित नहीं हो सका कि उन पर मौजूद खून इन्सान का था या नहीं। पोस्टमार्टम करने वाले डॉक्टर ने माना कि मृतक के शरीर पर चोट नहर में ऊंचाई से गिरने के कारण भी आ सकती है। लिहाजा, कोर्ट ने सत्र अदालत के फैसले को बरकरार रखा। कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि परिस्थितिजन्य साक्ष्य के आधार पर सजा तभी हो सकती है जब साक्ष्यों की कड़ी पूरी हो। इस मामले में लूट का मकसद भी साबित नहीं हो पाया। 

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