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इलाहाबाद सीट पर टूटा जाति का तिलिस्म
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, प्रयागराज
Published by: विनोद सिंह
Updated Fri, 24 May 2019 02:00 AM IST
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Reeta
- फोटो : प्रयागराज
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इलाहाबाद सीट पर लगातार दूसरी बार मोदी मैजिक के आगे जाति का तिलिस्म टूट गया। इस सीट पर ब्राह्मण और ओबीसी, खासतौर पर पटेल जाति के वोटर हमेशा निर्णायक साबित होते रहे हैं। पार्टियां भी जातिगत आंकड़ों के आधार पर ही अपने प्रत्याशी चुनती रहीं हैं लेकिन, 2014 के लोकसभा चुनाव में यह समीकरण काम नहीं आ सका था और इस बार भी कमोवेश यही स्थिति रही।
सपा-बसपा गठबंधन ने जब राजेंद्र सिंह पटेल को अपना प्रत्याशी घोषित किया, तो सपा और बसपा के ही बहुत से कार्यकर्ता प्रत्याशी के बारे कुछ नहीं जानते थे। लेकिन तर्क यही दिया जा रहा था कि पटेल जाति के प्रत्याशी को चुनाव मैदान में उतारने से बात बन सकती है। वहीं, कांग्रेस ने भी भाजपा में रहे योगेश शुक्ला को टिकट देकर अपनी पार्टी में शामिल कर लिया था। इसके पीछे भी जातिगत समीकरण की भूमिका प्रमुख मानी जा रही थी। जानकारों का मानना था कि योगेश ब्राह्मणों का वोट काटेंगे और नुकसान भाजपा को लेकर लेकिन यह समीकरण भी काम नहीं आया।
कांग्रेस प्रत्याशी की जमानत जब्त हो गई और गठबंधन के प्रत्याशी को भी बड़े अंतर से हार का मुंह देखना पड़ा। परिणाम सामने आने के बाद साफ हो गया कि जिस तरह पिछले चुनाव में श्याम चरण गुप्ता को मोदी के नाम पर वोट मिले थे और बसपा से चुनाव लड़ीं केशरी देवी पटेल को तीसरे नंबर से संतोष करना पड़ा था। उसी तरह इस बार डॉ. रीता बहुगुणा जोशी की जीत में भी मोदी मैजिक जमकर चला और जाति का तिलिस्म फिर टूट गया।
पूर्व के चुनावों में भी इलाहाबाद सीट पर जाति को हथियार बनाकर लड़ाई होती रही है। भाजपा के वरिष्ठ नेता डॉ. मुरली मनोहर जोशी लगातार तीन बार वर्ष 1996, 1998 और 1999 में इलाहाबाद सीट से सांसद रहे। 1996 के चुनाव में बसपा ने उनके खिलाफ राम सेवक सिंह पटेल और 1999 में राम दुलार सिंह पटेल को चुनाव मैदान में उतारा था। वर्ष 2004 में जब रेवती रमण सिंह सपा के टिकट पर यहां से चुनाव जीते तो उस वक्त बसपा ने आरके सिंह पटेल को टिकट दिया था। इस चुनाव में भाजपा के टिकट पर लड़े डॉ. मुरली मनोहर जोशी दूसरे नंबर पर थे।
भाजपा प्रत्याशी डॉ. रीता बहुगुणा जोशी ने पहले ही चक्र से अपने प्रतिद्वंद्वी गठबंधन प्रत्याशी राजेंद्र सिंह के खिलाफ 8144 वोटों के अंतर से बढ़त बना ली थी। दूसरे चरण की मतगणना में रीता ने फिर 8646 मतों से बढ़त हासिल कर ली और अब कुल बढ़त 16790 मतों की हो चुकी थी। डॉ. रीता जोशी चरण की मतगणना के साथ तेजी से आगे बढ़ रहीं थीं और प्रतिद्वंद्वी प्रत्याशी के समर्थकों के चेहरे पर शिकन बढ़ती जा रही थी। वहां मौजूद गठबंधन प्रत्याशी के अभिकर्ताओं को समझने में देर नहीं लगी कि मामला अब हाथ से निकल चुका है। कई बूथों की मतगणना पूरी होने से काफी पहले ही अभिकर्ता वहां से चले गए।
मतगणना के पहले ही चरण में कांग्रेस प्रत्याश की हार के संकेत मिल गए। इस चरण में भाजपा और गठबंधन को जहां हजारों की संख्या में वोट मिले, वहीं कांग्रेस प्रत्याशी योगेश शुक्ला को महज 87 वोटों से संतोष करना पड़ा दूसरे चरण में भी कांग्रेस प्रत्याशी की हालत काफी खराब रही और प्रत्याशी को महज 144 वोट मिले। तकरीबन सभी चरणों में कांग्रेस प्रत्याशी की यही हालत रही।
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सपा-बसपा गठबंधन ने जब राजेंद्र सिंह पटेल को अपना प्रत्याशी घोषित किया, तो सपा और बसपा के ही बहुत से कार्यकर्ता प्रत्याशी के बारे कुछ नहीं जानते थे। लेकिन तर्क यही दिया जा रहा था कि पटेल जाति के प्रत्याशी को चुनाव मैदान में उतारने से बात बन सकती है। वहीं, कांग्रेस ने भी भाजपा में रहे योगेश शुक्ला को टिकट देकर अपनी पार्टी में शामिल कर लिया था। इसके पीछे भी जातिगत समीकरण की भूमिका प्रमुख मानी जा रही थी। जानकारों का मानना था कि योगेश ब्राह्मणों का वोट काटेंगे और नुकसान भाजपा को लेकर लेकिन यह समीकरण भी काम नहीं आया।
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कांग्रेस प्रत्याशी की जमानत जब्त हो गई और गठबंधन के प्रत्याशी को भी बड़े अंतर से हार का मुंह देखना पड़ा। परिणाम सामने आने के बाद साफ हो गया कि जिस तरह पिछले चुनाव में श्याम चरण गुप्ता को मोदी के नाम पर वोट मिले थे और बसपा से चुनाव लड़ीं केशरी देवी पटेल को तीसरे नंबर से संतोष करना पड़ा था। उसी तरह इस बार डॉ. रीता बहुगुणा जोशी की जीत में भी मोदी मैजिक जमकर चला और जाति का तिलिस्म फिर टूट गया।
पूर्व के चुनावों में भी इलाहाबाद सीट पर जाति को हथियार बनाकर लड़ाई होती रही है। भाजपा के वरिष्ठ नेता डॉ. मुरली मनोहर जोशी लगातार तीन बार वर्ष 1996, 1998 और 1999 में इलाहाबाद सीट से सांसद रहे। 1996 के चुनाव में बसपा ने उनके खिलाफ राम सेवक सिंह पटेल और 1999 में राम दुलार सिंह पटेल को चुनाव मैदान में उतारा था। वर्ष 2004 में जब रेवती रमण सिंह सपा के टिकट पर यहां से चुनाव जीते तो उस वक्त बसपा ने आरके सिंह पटेल को टिकट दिया था। इस चुनाव में भाजपा के टिकट पर लड़े डॉ. मुरली मनोहर जोशी दूसरे नंबर पर थे।
भाजपा प्रत्याशी डॉ. रीता बहुगुणा जोशी ने पहले ही चक्र से अपने प्रतिद्वंद्वी गठबंधन प्रत्याशी राजेंद्र सिंह के खिलाफ 8144 वोटों के अंतर से बढ़त बना ली थी। दूसरे चरण की मतगणना में रीता ने फिर 8646 मतों से बढ़त हासिल कर ली और अब कुल बढ़त 16790 मतों की हो चुकी थी। डॉ. रीता जोशी चरण की मतगणना के साथ तेजी से आगे बढ़ रहीं थीं और प्रतिद्वंद्वी प्रत्याशी के समर्थकों के चेहरे पर शिकन बढ़ती जा रही थी। वहां मौजूद गठबंधन प्रत्याशी के अभिकर्ताओं को समझने में देर नहीं लगी कि मामला अब हाथ से निकल चुका है। कई बूथों की मतगणना पूरी होने से काफी पहले ही अभिकर्ता वहां से चले गए।
मतगणना के पहले ही चरण में कांग्रेस प्रत्याश की हार के संकेत मिल गए। इस चरण में भाजपा और गठबंधन को जहां हजारों की संख्या में वोट मिले, वहीं कांग्रेस प्रत्याशी योगेश शुक्ला को महज 87 वोटों से संतोष करना पड़ा दूसरे चरण में भी कांग्रेस प्रत्याशी की हालत काफी खराब रही और प्रत्याशी को महज 144 वोट मिले। तकरीबन सभी चरणों में कांग्रेस प्रत्याशी की यही हालत रही।