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Balrampur News: सावन से पहले सजने लगा 400 वर्ष पुराना शिवगढ़ धाम, जलाभिषेक की तैयारी तेज
Sat, 18 Jul 2026 10:55 PM IST
लखनऊ ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, बलरामपुर
संवाद न्यूज एजेंसी, बलरामपुर
Updated Sat, 18 Jul 2026 10:55 PM IST
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पचपेड़वा। श्रावण मास के आगमन के साथ ही नगर स्थित करीब 400 वर्ष पुराने प्राचीन शिवगढ़ धाम में तैयारियां तेज हो गई हैं। सावन में होने वाले जलाभिषेक को लेकर मंदिर परिसर की साफ-सफाई, रंग-रोगन और सुंदरीकरण का कार्य अंतिम चरण में पहुंच गया है। हर वर्ष सावन में पांच से दस हजार श्रद्धालु बाबा भोलेनाथ का जलाभिषेक करने यहां पहुंचते हैं। इस बार भी कांवड़ियों और दूर-दराज से आने वाले श्रद्धालुओं की संभावित भीड़ को देखते हुए मंदिर समिति और प्रशासन व्यवस्थाओं को अंतिम रूप देने में जुटा है।
शिवगढ़ धाम लंबे समय से श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र बना हुआ है। सावन के प्रत्येक सोमवार और पूरे श्रावण मास में मंदिर में सुबह से देर रात तक श्रद्धालुओं की लंबी कतारें लगी रहती हैं। लखनऊ, कानपुर, वाराणसी, पचपेड़वा, गैसड़ी, तुलसीपुर सहित नेपाल से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां पहुंचकर भगवान शिव का जलाभिषेक करते हैं। महाशिवरात्रि, कजली तीज और अन्य धार्मिक पर्वों पर भी यहां हजारों श्रद्धालु दर्शन-पूजन के लिए पहुंचते हैं।
श्रद्धालुओं की सुविधा को देखते हुए मंदिर परिसर में साफ-सफाई के साथ पेयजल, बेलपत्र, पूजन सामग्री और अन्य आवश्यक व्यवस्थाएं की जा रही हैं। जलाभिषेक के दौरान महिला और पुरुष श्रद्धालुओं के लिए अलग-अलग कतारों की व्यवस्था की जाएगी, ताकि दर्शन और पूजन सुचारु रूप से हो सके। भीड़ नियंत्रण और सुरक्षा व्यवस्था को लेकर प्रशासन भी सतर्क है।
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मंदिर के पुजारी तेरस गिरी ने बताया कि सावन को लेकर तैयारियां लगभग पूरी कर ली गई हैं। श्रद्धालु अपने घरों से गंगाजल और अन्य पवित्र जल लेकर जलाभिषेक के लिए पहुंचते हैं। मंदिर परिसर में पूजन सामग्री की पर्याप्त व्यवस्था रहेगी। सावन भर भंडारे का आयोजन किया जाएगा, जबकि बड़ी संख्या में दुकानदार भी अपनी दुकानें लगाएंगे।
चार सौ वर्ष पुराना है शिवगढ़ धाम का इतिहास
स्थानीय मान्यता के अनुसार करीब 400 वर्ष पहले बिशनपुर टंटनवा (वर्तमान पचपेड़वा क्षेत्र) निवासी छोटेलाल अपने खेत में गुड़ाई कर रहे थे। इसी दौरान उन्हें जमीन के अंदर एक शिवलिंग दिखाई दिया। बताया जाता है कि उसी स्थान पर पांच खाखरा (मिट्टी के पात्र) में खजाना भी मिला था।
शिवलिंग मिलने की घटना से आश्चर्यचकित छोटेलाल घर लौट आए। मान्यता है कि उसी रात उन्हें स्वप्न में भगवान शिव ने मंदिर निर्माण का निर्देश दिया। इसके बाद उन्होंने उसी स्थान पर मंदिर का निर्माण कराया, नियमित पूजा-अर्चना के लिए पुजारी की व्यवस्था की और अपनी 12 बीघा कृषि भूमि मंदिर के नाम दान कर दी। तभी से यह स्थान शिवगढ़ धाम के नाम से प्रसिद्ध है और क्षेत्र के प्रमुख धार्मिक स्थलों में शामिल है।
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शिवगढ़ धाम लंबे समय से श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र बना हुआ है। सावन के प्रत्येक सोमवार और पूरे श्रावण मास में मंदिर में सुबह से देर रात तक श्रद्धालुओं की लंबी कतारें लगी रहती हैं। लखनऊ, कानपुर, वाराणसी, पचपेड़वा, गैसड़ी, तुलसीपुर सहित नेपाल से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां पहुंचकर भगवान शिव का जलाभिषेक करते हैं। महाशिवरात्रि, कजली तीज और अन्य धार्मिक पर्वों पर भी यहां हजारों श्रद्धालु दर्शन-पूजन के लिए पहुंचते हैं।
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श्रद्धालुओं की सुविधा को देखते हुए मंदिर परिसर में साफ-सफाई के साथ पेयजल, बेलपत्र, पूजन सामग्री और अन्य आवश्यक व्यवस्थाएं की जा रही हैं। जलाभिषेक के दौरान महिला और पुरुष श्रद्धालुओं के लिए अलग-अलग कतारों की व्यवस्था की जाएगी, ताकि दर्शन और पूजन सुचारु रूप से हो सके। भीड़ नियंत्रण और सुरक्षा व्यवस्था को लेकर प्रशासन भी सतर्क है।
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मंदिर के पुजारी तेरस गिरी ने बताया कि सावन को लेकर तैयारियां लगभग पूरी कर ली गई हैं। श्रद्धालु अपने घरों से गंगाजल और अन्य पवित्र जल लेकर जलाभिषेक के लिए पहुंचते हैं। मंदिर परिसर में पूजन सामग्री की पर्याप्त व्यवस्था रहेगी। सावन भर भंडारे का आयोजन किया जाएगा, जबकि बड़ी संख्या में दुकानदार भी अपनी दुकानें लगाएंगे।
चार सौ वर्ष पुराना है शिवगढ़ धाम का इतिहास
स्थानीय मान्यता के अनुसार करीब 400 वर्ष पहले बिशनपुर टंटनवा (वर्तमान पचपेड़वा क्षेत्र) निवासी छोटेलाल अपने खेत में गुड़ाई कर रहे थे। इसी दौरान उन्हें जमीन के अंदर एक शिवलिंग दिखाई दिया। बताया जाता है कि उसी स्थान पर पांच खाखरा (मिट्टी के पात्र) में खजाना भी मिला था।
शिवलिंग मिलने की घटना से आश्चर्यचकित छोटेलाल घर लौट आए। मान्यता है कि उसी रात उन्हें स्वप्न में भगवान शिव ने मंदिर निर्माण का निर्देश दिया। इसके बाद उन्होंने उसी स्थान पर मंदिर का निर्माण कराया, नियमित पूजा-अर्चना के लिए पुजारी की व्यवस्था की और अपनी 12 बीघा कृषि भूमि मंदिर के नाम दान कर दी। तभी से यह स्थान शिवगढ़ धाम के नाम से प्रसिद्ध है और क्षेत्र के प्रमुख धार्मिक स्थलों में शामिल है।