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राग छोड़कर आत्मा से करें अनुराग : मुनिश्री
Mon, 10 Aug 2026 12:08 AM IST
लखनऊ ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, बाराबंकी
संवाद न्यूज एजेंसी, बाराबंकी
Updated Mon, 10 Aug 2026 12:08 AM IST
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बाराबंकी। मंत्रों की गूंज, भक्तिभाव में डूबे श्रद्धालु, विधि-विधान से होती पूजा और हवन की उठती अग्नि शिखाओं के बीच श्री दिगंबर जैन मंदिर में रविवार को आध्यात्म और आराधना का अनुपम वातावरण दिखाई दिया। मुनि श्री सौम्य सागर जी के सान्निध्य में 1008 सिद्ध चक्र महामंडल विधान में सैकड़ों महिला-पुरुष श्रद्धालुओं ने पूजन-अर्चन किया और हवन में आहुतियां देकर आत्मकल्याण की कामना की।
मुनि श्री सौम्य सागर ने कहा कि सिद्ध चक्र महामंडल विधान सिद्धों की आराधना का एक महत्वपूर्ण साधन है। संसार में जन्म-मरण के बंधन से पूर्ण रूप से मुक्त होकर अनंत आनंद की अनुभूति केवल सिद्ध पुरुष ही कर सकते हैं। सिद्ध अवस्था को प्राप्त जीव सिद्धालय में विराजमान रहते हैं और फिर उनका संसार में पुनर्जन्म नहीं होता। भक्ति से ओतप्रोत महिलाओं ने भाव नृत्य भी किया। श्रद्धा और भक्ति का ऐसा वातावरण बना रहा कि हर कोई आध्यात्मिक अनुभूति में सराबोर नजर आया।
इस मौके पर मुनिश्री ने श्रद्धालुओं को जीवन के सबसे गहरे आध्यात्मिक सत्य से परिचित कराते हुए कहा कि संसार के अधिकांश प्राणी जन्म-मरण के बंधन से इसलिए मुक्त नहीं हो पाते, क्योंकि प्रत्येक भव में वे राग और अनुराग के बंधन में उलझे रहते हैं। राग व्यक्ति को आगे बढ़ने से रोकता है। जब तक मन राग में बंधा रहेगा, तब तक आत्मा सिद्धत्व की दिशा में आगे नहीं बढ़ सकती।
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पूजन के साथ आत्मशुद्धि का संदेश
1008 सिद्धचक्र महामंडल विधान के दौरान श्रद्धालुओं ने विधि-विधान से सिद्ध परमेष्ठी की आराधना की। पूजन के बाद हवन में श्रद्धालुओं ने आहुतियां अर्पित कीं। व्यक्ति को अपनी आत्मा से ही राग रखना चाहिए, जिससे उसका कल्याण हो सके। मुनिश्री के सान्निध्य में श्रद्धालुओं ने धर्म, आत्मशुद्धि और मोक्षमार्ग की ओर बढ़ने का संकल्प लिया। ल
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मुनि श्री सौम्य सागर ने कहा कि सिद्ध चक्र महामंडल विधान सिद्धों की आराधना का एक महत्वपूर्ण साधन है। संसार में जन्म-मरण के बंधन से पूर्ण रूप से मुक्त होकर अनंत आनंद की अनुभूति केवल सिद्ध पुरुष ही कर सकते हैं। सिद्ध अवस्था को प्राप्त जीव सिद्धालय में विराजमान रहते हैं और फिर उनका संसार में पुनर्जन्म नहीं होता। भक्ति से ओतप्रोत महिलाओं ने भाव नृत्य भी किया। श्रद्धा और भक्ति का ऐसा वातावरण बना रहा कि हर कोई आध्यात्मिक अनुभूति में सराबोर नजर आया।
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इस मौके पर मुनिश्री ने श्रद्धालुओं को जीवन के सबसे गहरे आध्यात्मिक सत्य से परिचित कराते हुए कहा कि संसार के अधिकांश प्राणी जन्म-मरण के बंधन से इसलिए मुक्त नहीं हो पाते, क्योंकि प्रत्येक भव में वे राग और अनुराग के बंधन में उलझे रहते हैं। राग व्यक्ति को आगे बढ़ने से रोकता है। जब तक मन राग में बंधा रहेगा, तब तक आत्मा सिद्धत्व की दिशा में आगे नहीं बढ़ सकती।
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पूजन के साथ आत्मशुद्धि का संदेश
1008 सिद्धचक्र महामंडल विधान के दौरान श्रद्धालुओं ने विधि-विधान से सिद्ध परमेष्ठी की आराधना की। पूजन के बाद हवन में श्रद्धालुओं ने आहुतियां अर्पित कीं। व्यक्ति को अपनी आत्मा से ही राग रखना चाहिए, जिससे उसका कल्याण हो सके। मुनिश्री के सान्निध्य में श्रद्धालुओं ने धर्म, आत्मशुद्धि और मोक्षमार्ग की ओर बढ़ने का संकल्प लिया। ल