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Deoria News: अयोध्या तीर्थंकरों की शाश्वत जन्मभूमि
संवाद न्यूज एजेंसी, देवरिया
Updated Sat, 24 Jan 2026 12:10 AM IST
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खुखुंदू। अयोध्या तीर्थंकरों की शाश्वत जन्मभूमि है तो काकंदी नगरी (वर्तमान में खुखुंदू) कल्याणक भूमि है। यहां के बारे में जैन दर्शन में तीर्थंकरों की परंपरा रही है। यहां नौवें तीर्थंकर भगवान पुष्पदंत नाथ महराज के तीन कल्याणक (गर्भ, जन्म, दीक्षा) हुए।
यह बातें दिगंबर जैनाचार्य 108 वसुनंदी जी महाराज ने कहीं। वह ससंघ पदयात्रा करते बृहस्पतिवार शाम को खुखुंदू जैन मंदिर पहुंचे हैं। शुक्रवार को यहां विश्राम के बाद फिर शनिवार को कुशीनगर के लिए निकलेंगे।
उन्होंने बताया कि भरत क्षेत्र (दक्षिण में) और ऐरावत क्षेत्र (उत्तर में) जम्बूद्वीप के दो छोरों पर स्थित कर्मभूमि हैं, जहां 24 तीर्थंकर होते हैं। बताया कि पूरे ढाई द्वीप में पांच भरत तो पांच ऐरावत और पांच ही विदेश क्षेत्र है।
इसमें विदेश क्षेत्र हमेशा शाश्वत कर्म भूमि रही है। अतः वहां हमेशा तीर्थंकर होते है, लेकिन भरत और ऐरावत क्षेत्र में सिर्फ चौथे काल में ही तीर्थंकर होते हैं। जैनाचार्य वसुनंदी जी महाराज ने बताया कि जैन दर्शन में मोक्ष का स्वरूप आत्मा का समस्त कर्मों से रहित हो जाना माना जाता है। इसे निर्माण अवस्था भी कहा जाता है। निर्माण अवस्था का मार्ग जैन दर्शन में सम्यक दर्शन और सम्यक ज्ञान अर्थात श्रद्धा और आस्था का ज्ञान है। उन्होंने बताया कि अब तक देश के करीब-करीब तीन हजार से अधिक प्रसिद्ध जैन मंदिरों का पैदल ही भ्रमण कर चुका हूं।
इधर, पिछले साल दिसंबर महीने से अस्वस्थ होने से थोड़ी-बहुत पालकी से यात्रा कर लेते है। वसुनंदी महाराज के जत्थे में करीब 40 ससंघी शामिल हैं। इसमें करीब 20 महिलाएं (आर्रिकाएं) और बाकी साधु शामिल हैं।
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यह बातें दिगंबर जैनाचार्य 108 वसुनंदी जी महाराज ने कहीं। वह ससंघ पदयात्रा करते बृहस्पतिवार शाम को खुखुंदू जैन मंदिर पहुंचे हैं। शुक्रवार को यहां विश्राम के बाद फिर शनिवार को कुशीनगर के लिए निकलेंगे।
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उन्होंने बताया कि भरत क्षेत्र (दक्षिण में) और ऐरावत क्षेत्र (उत्तर में) जम्बूद्वीप के दो छोरों पर स्थित कर्मभूमि हैं, जहां 24 तीर्थंकर होते हैं। बताया कि पूरे ढाई द्वीप में पांच भरत तो पांच ऐरावत और पांच ही विदेश क्षेत्र है।
इसमें विदेश क्षेत्र हमेशा शाश्वत कर्म भूमि रही है। अतः वहां हमेशा तीर्थंकर होते है, लेकिन भरत और ऐरावत क्षेत्र में सिर्फ चौथे काल में ही तीर्थंकर होते हैं। जैनाचार्य वसुनंदी जी महाराज ने बताया कि जैन दर्शन में मोक्ष का स्वरूप आत्मा का समस्त कर्मों से रहित हो जाना माना जाता है। इसे निर्माण अवस्था भी कहा जाता है। निर्माण अवस्था का मार्ग जैन दर्शन में सम्यक दर्शन और सम्यक ज्ञान अर्थात श्रद्धा और आस्था का ज्ञान है। उन्होंने बताया कि अब तक देश के करीब-करीब तीन हजार से अधिक प्रसिद्ध जैन मंदिरों का पैदल ही भ्रमण कर चुका हूं।
इधर, पिछले साल दिसंबर महीने से अस्वस्थ होने से थोड़ी-बहुत पालकी से यात्रा कर लेते है। वसुनंदी महाराज के जत्थे में करीब 40 ससंघी शामिल हैं। इसमें करीब 20 महिलाएं (आर्रिकाएं) और बाकी साधु शामिल हैं।
