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Etah News: मक्का खरीद पर भारी पड़ रहा गेहूं का भंडारण, मंडी में 4000 क्विंटल स्टॉक बना बाधा

Wed, 01 Jul 2026 02:55 AM IST
Agra Bureau आगरा ब्यूरो
Updated Wed, 01 Jul 2026 02:55 AM IST
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etah news wheat storage
एटा। जिले में मक्का खरीद का सीजन शुरू होने के साथ ही मंडी समिति में पहले से रखा गेहूं का भारी भंडारण नई समस्या बनकर सामने आया है। मंडी परिसर में करीब चार हजार क्विंटल गेहूं अब भी पड़ा हुआ है। शासन के निर्देशानुसार 30 जून तक इस गेहूं का उठान कर लिया जाना था लेकिन निर्धारित समय सीमा बीत जाने के बाद भी उठान पूरा नहीं हो सका। इसका सीधा असर मक्का खरीद व उसके भंडारण की व्यवस्था पर पड़ रहा है। वहीं मानसून की सक्रियता और लगातार आंधी-बारिश के बीच खुले में रखा गेहूं खराब होने का खतरा भी गहराता जा रहा है।
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जिले में 15 जून से मक्का की सरकारी खरीद शुरू की गई थी। इसी दिन तक गेहूं खरीद का कार्य भी चला। खरीद प्रक्रिया समाप्त होने के बाद उम्मीद थी कि मंडी और क्रय केंद्रों पर रखा गेहूं तय समय के भीतर गोदामों तक पहुंचा दिया जाएगा, जिससे मक्का की आवक के लिए पर्याप्त स्थान उपलब्ध हो सके। लेकिन ऐसा नहीं हो पाया। वर्तमान में मंडी परिसर और विभिन्न क्रय केंद्रों पर बड़ी मात्रा में गेहूं का स्टॉक जमा है जिससे मक्का की खरीद और भंडारण की व्यवस्था प्रभावित हो रही है। गेहूं के उठान की जिम्मेदारी हैंडलिंग ठेकेदारों को सौंपी गई थी लेकिन कार्य में अपेक्षित गति नहीं दिखाई गई। परिणामस्वरूप हजारों क्विंटल गेहूं अब भी मंडी में पड़ा है। विभागीय कर्मचारियों का कहना है कि यदि समय रहते उठान नहीं हुआ तो आने वाले दिनों में मक्का की बढ़ती आवक के कारण भंडारण व्यवस्था पूरी तरह प्रभावित हो सकती है। इससे किसानों को भी अपनी उपज लेकर मंडी में अनावश्यक इंतजार करना पड़ सकता है। विपणन विभाग के अधिकारियों व कर्मचारियों की चिंता इसलिए भी बढ़ गई है क्योंकि मानसून के दौरान मौसम लगातार बदल रहा है। तेज आंधी और बारिश की स्थिति में खुले में रखा गेहूं भीगने से उसकी गुणवत्ता प्रभावित होने की आशंका है। यदि ऐसा होता है तो सरकारी खरीद के गेहूं को नुकसान पहुंचने के साथ-साथ आर्थिक क्षति भी उठानी पड़ सकती है।
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दूसरी ओर मंडी में पल्लेदारों की कमी भी व्यवस्था पर भारी पड़ रही है। पहले पल्लेदार 20 रुपये प्रति क्विंटल की दर से मजदूरी पर कार्य करते थे, लेकिन मक्का की लगातार बढ़ रही आवक और कार्यभार को देखते हुए उन्होंने मजदूरी बढ़ाकर 40 रुपये प्रति क्विंटल कर दी है। मजदूरी बढ़ने के बावजूद पर्याप्त संख्या में पल्लेदार उपलब्ध नहीं हो पा रहे हैं। इसका असर लोडिंग और अनलोडिंग के कार्य पर साफ दिखाई दे रहा है।
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