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Firozabad News: नगर आयुक्त की हार, पंप ऑपरेटर के हक में कोर्ट की मुहर
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फिरोजाबाद। एक नलकूप/पंप चालक मजदूर की 15 वर्षों से चली आ रही न्याय की लड़ाई में आखिरकार जीत हुई। एडीजे-10 निर्दोष कुमार की अदालत ने श्रम न्यायालय के फैसले को सही मानते हुए नगर निगम की ओर से नगर आयुक्त/उपनगर आयुक्त की अपील निरस्त कर दी है। कोर्ट ने आदेश में साफ कहा है कि नगर निगम ठेकेदार के जरिए काम करवाने का बहाना बनाकर किसी गरीब मजदूर का हक और मेहनत का पैसा नहीं मार सकता। यह आदेश उन सभी नलकूप ऑपरेटरों की नौकरी व वेतन बहाली के लिए नजीर साबित हो सकता है, जो सालों से अपने हक की लड़ाई लड़ रहे हैं।
सुहागनगर निवासी धर्मेंद्र चतुर्वेदी ने नगर निगम (तत्कालीन नगर पालिका परिषद) में 1 मई 2011 से 9 जनवरी 2013 तक पंप चालक के पद पर कार्य किया था। उनका 108 रुपये और 125 रुपये प्रतिदिन के हिसाब से कुल 75,936 का वेतन बकाया था। बार-बार गुहार लगाने के बावजूद जब निगम ने भुगतान नहीं किया और 10 जनवरी 2013 को सेवा समाप्त कर दी, तो पीड़ित ने श्रम न्यायालय/सहायक श्रमायुक्त का दरवाजा खटखटाया।
नगर निगम ने बचाव में कहा था कि धर्मेंद्र की कोई आधिकारिक नियुक्ति नहीं थी और नलकूपों का संचालन निजी ठेकेदारों के माध्यम से होता था, इसलिए देनदारी ठेकेदार की है। हालांकि, अदालत ने अनुबंध पत्रों का अध्ययन कर पाया कि भले ही ठेका किसी फर्म का था, लेकिन नलकूप संचालकों के वेतन का वितरण नगर निगम कार्यालय की खिड़की से ही अधिकारी के सामने होता था।
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इसके अलावा, नगर निगम ने पूर्व में हाईकोर्ट में स्वीकार किया था कि धर्मेंद्र उनके यहां ठेकेदार के जरिए दैनिक वेतनभोगी थे। निगम कोर्ट में मूल उपस्थिति व वेतन रजिस्टर भी पेश नहीं कर सका। अदालत ने माना कि निगम 2011 से 2025 तक मजदूर को सिर्फ कानूनी उलझनों में फंसाता रहा।
अंततः बीती 29 जुलाई को एडीजे कोर्ट ने श्रम न्यायालय/सहायक श्रमायुक्त की ओर से 17 अप्रैल 2025 को मजदूर के पक्ष में पारित आदेश की पुष्टि करते हुए नगर निगम की अपील को खारिज कर दिया।
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सुहागनगर निवासी धर्मेंद्र चतुर्वेदी ने नगर निगम (तत्कालीन नगर पालिका परिषद) में 1 मई 2011 से 9 जनवरी 2013 तक पंप चालक के पद पर कार्य किया था। उनका 108 रुपये और 125 रुपये प्रतिदिन के हिसाब से कुल 75,936 का वेतन बकाया था। बार-बार गुहार लगाने के बावजूद जब निगम ने भुगतान नहीं किया और 10 जनवरी 2013 को सेवा समाप्त कर दी, तो पीड़ित ने श्रम न्यायालय/सहायक श्रमायुक्त का दरवाजा खटखटाया।
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नगर निगम ने बचाव में कहा था कि धर्मेंद्र की कोई आधिकारिक नियुक्ति नहीं थी और नलकूपों का संचालन निजी ठेकेदारों के माध्यम से होता था, इसलिए देनदारी ठेकेदार की है। हालांकि, अदालत ने अनुबंध पत्रों का अध्ययन कर पाया कि भले ही ठेका किसी फर्म का था, लेकिन नलकूप संचालकों के वेतन का वितरण नगर निगम कार्यालय की खिड़की से ही अधिकारी के सामने होता था।
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इसके अलावा, नगर निगम ने पूर्व में हाईकोर्ट में स्वीकार किया था कि धर्मेंद्र उनके यहां ठेकेदार के जरिए दैनिक वेतनभोगी थे। निगम कोर्ट में मूल उपस्थिति व वेतन रजिस्टर भी पेश नहीं कर सका। अदालत ने माना कि निगम 2011 से 2025 तक मजदूर को सिर्फ कानूनी उलझनों में फंसाता रहा।
अंततः बीती 29 जुलाई को एडीजे कोर्ट ने श्रम न्यायालय/सहायक श्रमायुक्त की ओर से 17 अप्रैल 2025 को मजदूर के पक्ष में पारित आदेश की पुष्टि करते हुए नगर निगम की अपील को खारिज कर दिया।