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Firozabad News: युवा 8 घंटे तक स्क्रीन पर, गायब हुई नींद और याददाश्त
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फिरोजाबाद। टेक्नोलॉजी के इस दौर में युवा वर्ग मोबाइल और लैपटॉप की स्क्रीन का गुलाम होता जा रहा है। स्वशासी मेडिकल कॉलेज में आने वाले केसों के अनुसार चिकित्सकों का कहना है कि जनपद के युवा प्रतिदिन औसतन 7 से 8 घंटे स्क्रीन पर बिता रहे हैं। इसका सीधा प्रहार उनकी नींद पर पड़ा है, जिससे उनमें कम उम्र में भूलने की बीमारी के लक्षण तेजी से उभर रहे हैं।
प्रमुख न्यूरोसर्जन डॉ. निमित गुप्ता के अनुसार, रात के समय मोबाइल और लैपटॉप से निकलने वाली सफेद और नीली रोशनी मस्तिष्क को यह संकेत देती है कि अभी दिन है। इससे नींद के लिए जिम्मेदार हार्मोन का संतुलन बिगड़ जाता है। काउंसलिंग के दौरान पता चला है कि युवा और महिलाएं सबसे ज्यादा इससे पीड़ित हैं। उनका कीमती समय पढ़ाई या काम के बजाय बार-बार सोशल मीडिया पर रील देखने और स्क्रॉल करने में बर्बाद हो रहा है।
याददाश्त पर टॉक्सिक हमला
डॉक्टरों ने चेतावनी दी है कि 7-8 घंटे की गहरी नींद मस्तिष्क के लिए संजीवनी है। नींद के दौरान मस्तिष्क से हानिकारक टॉक्सिक (विषाक्त पदार्थ) बाहर निकलते हैं। पर्याप्त नींद न लेने से ये टॉक्सिक मस्तिष्क में जमा होने लगते हैं, जिससे डिमेंशिया यानी भूलने का रोग और मानसिक धुंधलापन कम उम्र में ही युवाओं को घेर रहा है।
आचरण में बदलाव और गंभीर बीमारियों का खतरा
अनिद्रा केवल याददाश्त ही नहीं, बल्कि युवाओं के व्यवहार को भी बदल रही है। चिड़चिड़ापन, अचानक गुस्सा आना और एकाग्रता में कमी जैसे लक्षण पाए जा रहे हैं। मधुमेह, उच्च रक्तचाप और मोटापे जैसी जीवनशैली से जुड़ी बीमारियां शरीर को खोखला कर रही हैं।
विशेषज्ञों की सलाह: समय रहते संभल जाएं
मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य डा. योगेश गोयल ने बताया कि ओपीडी में हर रोज अनिद्रा के 15 से 20 नए मरीज आ रहे हैं। अनिद्रा के उपचार के लिए सबसे पहले स्क्रीन टाइम को कम करना होगा। सोने से एक घंटा पहले सभी डिजिटल उपकरणों को बंद कर दें और यदि सप्ताह में तीन बार से अधिक नींद खराब हो रही है, तो तुरंत डॉक्टर की सलाह लें।
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प्रमुख न्यूरोसर्जन डॉ. निमित गुप्ता के अनुसार, रात के समय मोबाइल और लैपटॉप से निकलने वाली सफेद और नीली रोशनी मस्तिष्क को यह संकेत देती है कि अभी दिन है। इससे नींद के लिए जिम्मेदार हार्मोन का संतुलन बिगड़ जाता है। काउंसलिंग के दौरान पता चला है कि युवा और महिलाएं सबसे ज्यादा इससे पीड़ित हैं। उनका कीमती समय पढ़ाई या काम के बजाय बार-बार सोशल मीडिया पर रील देखने और स्क्रॉल करने में बर्बाद हो रहा है।
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याददाश्त पर टॉक्सिक हमला
डॉक्टरों ने चेतावनी दी है कि 7-8 घंटे की गहरी नींद मस्तिष्क के लिए संजीवनी है। नींद के दौरान मस्तिष्क से हानिकारक टॉक्सिक (विषाक्त पदार्थ) बाहर निकलते हैं। पर्याप्त नींद न लेने से ये टॉक्सिक मस्तिष्क में जमा होने लगते हैं, जिससे डिमेंशिया यानी भूलने का रोग और मानसिक धुंधलापन कम उम्र में ही युवाओं को घेर रहा है।
आचरण में बदलाव और गंभीर बीमारियों का खतरा
अनिद्रा केवल याददाश्त ही नहीं, बल्कि युवाओं के व्यवहार को भी बदल रही है। चिड़चिड़ापन, अचानक गुस्सा आना और एकाग्रता में कमी जैसे लक्षण पाए जा रहे हैं। मधुमेह, उच्च रक्तचाप और मोटापे जैसी जीवनशैली से जुड़ी बीमारियां शरीर को खोखला कर रही हैं।
विशेषज्ञों की सलाह: समय रहते संभल जाएं
मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य डा. योगेश गोयल ने बताया कि ओपीडी में हर रोज अनिद्रा के 15 से 20 नए मरीज आ रहे हैं। अनिद्रा के उपचार के लिए सबसे पहले स्क्रीन टाइम को कम करना होगा। सोने से एक घंटा पहले सभी डिजिटल उपकरणों को बंद कर दें और यदि सप्ताह में तीन बार से अधिक नींद खराब हो रही है, तो तुरंत डॉक्टर की सलाह लें।