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Hardoi News: सस्ता इलाज सिर्फ कागजों पर ओपीडी से लेकर ओटी तक मरीजों की जेब हो रही खाली
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हरदोई। मेडिकल कॉलेज में सस्ता और बेहतर इलाज मिलने का दावा जमीनी हकीकत से कोसों दूर नजर आ रहा है। मरीज का पर्चा भले ही एक रुपये का बनता है लेकिन मरीजों की बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं की आस अस्पताल की चौखट पर कदम रखते ही टूट जाती है। ओपीडी से लेकर इमरजेंसी और ऑपरेशन थिएटर तक हर जगह तीमारदारों की जेब ढीली हो रही है। स्थिति यह है कि सिर्फ डॉक्टर का परामर्श मुफ्त है बाकी सारा बोझ मरीज व तीमारदार के कंधों पर है।
मेडिकल कॉलेज की ओपीडी में दिखाने आने वाले मरीजों को डॉक्टर दवाएं तो लिख रहे हैं लेकिन उनमें से अधिकांश अस्पताल के दवा काउंटर पर उपलब्ध ही नहीं हैं। फार्मेसी में आने वाले हर पर्चे में सिर्फ एक या दो दवाएं ही मिलती हैं जबकि तीन से चार दवाओं के लिए मरीजों को मेडिकल स्टोर पर जाना पड़ता है। गंभीर बीमारियों की बात तो दूर सामान्य बुखार और दर्द की दवाएं भी मेडिकल कॉलेज से नदारद हैं।
पैथोलॉजी में रक्त नमूने की जांच कराने में भी मरीजों को जेब ढीली करनी पड़ती है। कुछ मामूली जांचों को छोड़कर थायराइड, विटामिन, हार्मोन और कैंसर समेत तमाम जांचों के लिए शुल्क निर्धारित किया जा चुका है। सबसे बुरा हॉल ऑपरेशन थिएटर का है। किसी मरीज का ऑपरेशन होने पर सर्जिकल सामान की लंबी लिस्ट थमा दी जाती है। कई सामान तीमारदारों को बाजार से खरीदने पड़ते हैं।
बताया जाता सिर्फ दुकान का पता
हड्डी विभाग में तो स्थिति और भी बुरी है वहां ऑपरेशन के दौरान मरीज के तीमारदार को सिर्फ दुकान का पता बता दिया जाता है। न तो सामान की लिस्ट मिलती है और नहीं दुकान से सामान दिया जाता है। सामान्य ऑपरेशन के लिए भी 15 हजार से अधिक का सामान मंगवाया जाता है। तीमारदारों को सिर्फ दुकान पर पैसे जमा करने होते हैं। ऑपरेशन थिएटर में सामान पहुंच जाता है। कई बार तो सामान की कीमत काफी अधिक भी होती है।
जांच के लिए जमा किए 1380 रुपये
सुभाषनगर निवासी शिवकुमार ने बताया कि उनकी पत्नी की जांच होनी है। डॉक्टर ने जांचें लिखीं हैं पैथोलॉजी में उनका शुल्क पड़ता है। सरकारी जमा काउंटर से जांचों के 1380 रुपये की रसीद कटाई है। अब पैथोलॉजी पर जांच कराने जा रहे हैं।
मेडिकल स्टोर से खरीदी दवाएं
कटैया निवासी रामदेवी ने बताया कि हाथ में चकत्ते और खुजली होने पर डॉक्टर को दिखाया था। पर्चे पर तीन दवाएं लिखी गई थीं काउंटर पर एक भी दवा नहीं मिली। मेडिकल स्टोर से 185 रुपये की दवाएं खरीदकर लाए हैं।
दवाओं की कमी को लेकर मांग भेजी जा चुकी है। जिन दवाओं का भंडार कम है उन्हें जल्द पूरा किया जाएगा। कोई कर्मचारी बाहर से दवा लिखने या अनुपयोगी सामान मंगवाने का दबाव बनाता है तो उसकी लिखित शिकायत करें, कार्रवाई की जाएगी। -डॉ. जेबी गोगोई, प्रधानाचार्य
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मेडिकल कॉलेज की ओपीडी में दिखाने आने वाले मरीजों को डॉक्टर दवाएं तो लिख रहे हैं लेकिन उनमें से अधिकांश अस्पताल के दवा काउंटर पर उपलब्ध ही नहीं हैं। फार्मेसी में आने वाले हर पर्चे में सिर्फ एक या दो दवाएं ही मिलती हैं जबकि तीन से चार दवाओं के लिए मरीजों को मेडिकल स्टोर पर जाना पड़ता है। गंभीर बीमारियों की बात तो दूर सामान्य बुखार और दर्द की दवाएं भी मेडिकल कॉलेज से नदारद हैं।
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पैथोलॉजी में रक्त नमूने की जांच कराने में भी मरीजों को जेब ढीली करनी पड़ती है। कुछ मामूली जांचों को छोड़कर थायराइड, विटामिन, हार्मोन और कैंसर समेत तमाम जांचों के लिए शुल्क निर्धारित किया जा चुका है। सबसे बुरा हॉल ऑपरेशन थिएटर का है। किसी मरीज का ऑपरेशन होने पर सर्जिकल सामान की लंबी लिस्ट थमा दी जाती है। कई सामान तीमारदारों को बाजार से खरीदने पड़ते हैं।
बताया जाता सिर्फ दुकान का पता
हड्डी विभाग में तो स्थिति और भी बुरी है वहां ऑपरेशन के दौरान मरीज के तीमारदार को सिर्फ दुकान का पता बता दिया जाता है। न तो सामान की लिस्ट मिलती है और नहीं दुकान से सामान दिया जाता है। सामान्य ऑपरेशन के लिए भी 15 हजार से अधिक का सामान मंगवाया जाता है। तीमारदारों को सिर्फ दुकान पर पैसे जमा करने होते हैं। ऑपरेशन थिएटर में सामान पहुंच जाता है। कई बार तो सामान की कीमत काफी अधिक भी होती है।
जांच के लिए जमा किए 1380 रुपये
सुभाषनगर निवासी शिवकुमार ने बताया कि उनकी पत्नी की जांच होनी है। डॉक्टर ने जांचें लिखीं हैं पैथोलॉजी में उनका शुल्क पड़ता है। सरकारी जमा काउंटर से जांचों के 1380 रुपये की रसीद कटाई है। अब पैथोलॉजी पर जांच कराने जा रहे हैं।
मेडिकल स्टोर से खरीदी दवाएं
कटैया निवासी रामदेवी ने बताया कि हाथ में चकत्ते और खुजली होने पर डॉक्टर को दिखाया था। पर्चे पर तीन दवाएं लिखी गई थीं काउंटर पर एक भी दवा नहीं मिली। मेडिकल स्टोर से 185 रुपये की दवाएं खरीदकर लाए हैं।
दवाओं की कमी को लेकर मांग भेजी जा चुकी है। जिन दवाओं का भंडार कम है उन्हें जल्द पूरा किया जाएगा। कोई कर्मचारी बाहर से दवा लिखने या अनुपयोगी सामान मंगवाने का दबाव बनाता है तो उसकी लिखित शिकायत करें, कार्रवाई की जाएगी। -डॉ. जेबी गोगोई, प्रधानाचार्य