ईशन नदी में बाढ़: फसल जलमग्न, अब आबादी की ओर बढ़ रहा पानी, धान और किसान हुए बर्बाद
हाथरस की ईशन नदी में आया उफान सिर्फ पानी का सैलाब नहीं है, बल्कि यह इलाके के सैकड़ों किसानों के अरमानों, उम्मीदों और उनकी खून-पसीने की कमाई को बहा ले जाने वाला काल बन चुका है। नदी के बढ़ते जलस्तर ने खेतों को इस कदर डुबोया है कि हरी-भरी फसलें अब पानी के नीचे दम तोड़ रही हैं।
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
हाथरस में लगातार बारिश के बीच ईशन नदी का जलस्तर तेजी से बढ़ रहा है। नदी के आसपास के गांवों में एक हजार बीघा से ज्यादा फसल पहले ही जलमग्न हो चुकी है, अब पानी के आबादी में घुसने का खतरा बढ़ गया है, लेकिन प्रशासन ने अभी तक राहत और बचाव कार्य शुरू नहीं कराए हैं।
यदि मौसम विभाग की भविष्यवाणी के अनुरूप फिर तेज बारिश हुई तो इस बार नदी का पानी आसपास के गांवों की आबादी में घुसना तय है। इस आशंका ने फिलहाल इन गांवों के बाशिंदों की नींद उड़ा रखी है। दो साल पहले बाढ़ की विभीषिका झेल चुके इन गांवों के लोग ताजा खतरे की आशंका से सहमे हुए हैं और लाचार निगाहों से सरकारी मदद की राह देख रहे हैं। गौरतलब है कि अभी तक करीब 200 से 250 किसानों की फसल नदी के पानी की चपेट में आ चुकी है।
ये है स्थिति
- जलमग्न ज़मीन : 1000 बीघा से अधिक उपजाऊ कृषि भूमि पूरी तरह जलमग्न हो चुकी है।
- फसलों का नुकसान : खेतों में पांच-पांच फीट तक पानी जमा हो गया है। इस कारण धान की तैयार पौध पूरी तरह सड़कर नष्ट हो गई है।
- लागत डूबी : किसानों ने कर्ज लेकर और मेहनत से जो फसल बोई थी, वह अब पानी के नीचे है। किसानों के सामने अब परिवार के पालन-पोषण और अगली फसल की लागत जुटाने का गंभीर संकट खड़ा हो गया है।
ये गांव चपेट में आए
नगला ब्राह्मण, नवापुर, सिंचावली कदीम, नगला बरी पट्टी देवरी, नगला बिहारी, पुरदिलनगर, बरसामई, नगला मंधाती, सिहुरी, नगला उदइया, गोपालपुर, गूजरपुर, तालिमपुर, सुल्तानपुर, महाराजपुर आदि गांवों के खेत ईशन नदी के पानी की चपेट में आ चुके हैं।
सफाई न होने से जलकुंभी ने बढ़ाई मुसीबत
इस प्राकृतिक आपदा को मानवीय और प्रशासनिक लापरवाही ने और ज्यादा भयानक बना दिया है। ग्रामीणों का आरोप है कि मानसून से पहले ईशन नदी की सुध नहीं ली गई। नदी की समय पर सफाई न होने के कारण पानी के बहाव के साथ बहकर आई जलकुंभी पुलों के नीचे बुरी तरह फंस गई है।
रुका पानी, डूबे खेत
जलकुंभी के इस भारी जाम के कारण पानी आगे नहीं निकल पा रहा है और बैक मारकर खेतों में फैल रहा है। अगर समय रहते मशीनों से इस जलकुंभी को नहीं हटाया गया, तो स्थिति हाथ से निकल सकती है।
ईशन में बाढ़...धान और किसान, दोनों बर्बाद
हाथरस की ईशन नदी में आया उफान सिर्फ पानी का सैलाब नहीं है, बल्कि यह इलाके के सैकड़ों किसानों के अरमानों, उम्मीदों और उनकी खून-पसीने की कमाई को बहा ले जाने वाला काल बन चुका है। नदी के बढ़ते जलस्तर ने खेतों को इस कदर डुबोया है कि हरी-भरी फसलें अब पानी के नीचे दम तोड़ रही हैं। कृषि मानकों के अनुसार एक बीघा धान की फसल तैयार करने में करीब 4,500 से 6,000 का खर्च आता है। अगर औसत पांच हजार भी मान लें तो 280 बीघा में 14 लाख की भारी-भरकम पूंजी लगती है, लेकिन कुदरत के इस प्रकोप और प्रशासनिक उदासीनता ने किसानों को कहीं का नहीं छोड़ा है।
सत्यवीर की पूंजी और मेहनत पानी में बही
सिंचावली कदीम के पीड़ित किसान सत्यवीर सिंह ने इस उम्मीद में 280 बीघा खेत में धान की फसल शुरू की थी कि शायद इस बार पिछले सारे दुख धुल जाएंगे। खेत की जुताई हो चुकी थी, धान की पौध तैयार थी और 120 बीघा में रोपाई का काम पूरा कर, खाद-उर्वरक डालकर सिंचाई भी कर दी गई थी। बाकी बची ज़मीन पर रोपाई का काम चल ही रहा था कि अचानक ईशन नदी का मटमैला पानी काल बनकर खेतों में घुस गया। सत्यवीर बताते हैं कि वे अब तक करीब सात लाख रुपये इस फसल में झोंक चुके थे, जो अब तीन दिन से पानी में डूबे होने के कारण पूरी तरह गल चुके हैं। 2024 में भी ईशन नदी के पानी में उनकी 350 बीघा धान की फसल डूब गई थी।
मोहन कुशवाहा का छिन गया निवाला
पुरदिलनगर के किसान मोहन कुशवाहा ने पाई-पाई जोड़कर आठ बीघा खेतों में धान की रोपाई की थी, लेकिन उनकी पूरी फसल जलमग्न है।मोहन की आंखों के आंसू बताते हैं कि यह आठ बीघा फसल सिर्फ खेत नहीं, बल्कि उनके पूरे परिवार के पालन-पोषण का एकमात्र जरिया थी। फसल नष्ट होने के बाद अब मोहन के सामने बच्चों का पेट भरने का संकट खड़ा हो गया है। अब उनके पास सिर्फ और सिर्फ मजदूरी करने का ही सहारा बचा है। त्रासदी यह है कि एक तरफ घर चलाने के लिए मजदूरी करनी होगी, तो दूसरी तरफ जो कर्ज फसल के लिए लिया था, उसे चुकाने के लिए साहूकार दरवाजे पर दस्तक देंगे।