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Jalaun News: बुंदेलखंड एक्सप्रेसवे में तय सीमा से ज्यादा खनन, कंपनी ने भरा जुर्माना
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फोटो - 32 बुंदेलखंड एक्सप्रेस वे पर यहां तक किया गया था खनन। फाइल फोटो।
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उरई। बुंदेलखंड एक्सप्रेसवे निर्माण के दौरान निर्धारित दो मीटर सीमा से अधिक 16 मीटर गहराई तक मिट्टी खनन के मामले में राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने सख्ती दिखाई है। अधिकरण ने करोड़ों रुपये का जुर्माना और पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति वसूलने के बाद सुधारात्मक कार्य पूर्ण होने पर मामले का निस्तारण कर दिया।
शहर के नरछा निवासी आईटीआई कार्यकर्ता अरुण कुमार तिवारी ने 2023 में याचिका लगाई थी।एनजीटी की न्यायमूर्ति प्रकाश श्रीवास्तव और विशेषज्ञ सदस्य डॉ. ए. सेंथिल वेल की पीठ ने कार्यदायी कंपनी मेसर्स गावर लिमिटेड को अवैध खनन में दोषी माना।
दरअसल, शिकायतकर्ता अरुणक कुमार ने कंपनी पर निर्धारित सीमा से अधिक गहराई तक खोदाई करने और किसानों की भूमि को नुकसान पहुंचाने की बात कही थी। यह भी बताया था कि कंपनी को केवल दो मीटर गहराई तक ही खोदाई की अनुमति थी। इसके बावजूद कंपनी ने करीब 10 से 15 मीटर तक मिट्टी का अवैध खनन कर लिया गया।
इसके बाद केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ( सीपीसीबी) की हुई जांच में सामने आया कि खनन की अनुमति अधिकतम दो मीटर तक थी। कई स्थानों पर 16 मीटर तक खोदाई की गई जो नियमों का उल्लंघन है। हालांकि अधिकरण ने यह भी माना कि उस समय लागू प्रावधानों के अनुसार सड़क परियोजनाओं के लिए मिट्टी खनन के लिए पृथक पर्यावरणीय स्वीकृति आवश्यक नहीं थी। लेकिन, तय सीमा से अधिक खनन गंभीर है।
पीठ ने साल 2024 में कंपनी पर 1.29 करोड़ का जुर्माना लगाया गया। जिसे कंपनी ने जमा कर दिया गया। वहीं उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (यूपीपीसीबी) ने साल 2025 में 2.76 करोड़ रुपये की पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति निर्धारित की, जिसे भी परियोजना प्राधिकरण ने जमा कर दिया। एनजीटी ने कहा कि जुर्माना व क्षतिपूर्ति की राशि जमा होने और सुधारात्मक कदम उठाए जाने के बाद अब मामले में आगे कार्रवाई की आवश्यकता नहीं है।
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शहर के नरछा निवासी आईटीआई कार्यकर्ता अरुण कुमार तिवारी ने 2023 में याचिका लगाई थी।एनजीटी की न्यायमूर्ति प्रकाश श्रीवास्तव और विशेषज्ञ सदस्य डॉ. ए. सेंथिल वेल की पीठ ने कार्यदायी कंपनी मेसर्स गावर लिमिटेड को अवैध खनन में दोषी माना।
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दरअसल, शिकायतकर्ता अरुणक कुमार ने कंपनी पर निर्धारित सीमा से अधिक गहराई तक खोदाई करने और किसानों की भूमि को नुकसान पहुंचाने की बात कही थी। यह भी बताया था कि कंपनी को केवल दो मीटर गहराई तक ही खोदाई की अनुमति थी। इसके बावजूद कंपनी ने करीब 10 से 15 मीटर तक मिट्टी का अवैध खनन कर लिया गया।
इसके बाद केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ( सीपीसीबी) की हुई जांच में सामने आया कि खनन की अनुमति अधिकतम दो मीटर तक थी। कई स्थानों पर 16 मीटर तक खोदाई की गई जो नियमों का उल्लंघन है। हालांकि अधिकरण ने यह भी माना कि उस समय लागू प्रावधानों के अनुसार सड़क परियोजनाओं के लिए मिट्टी खनन के लिए पृथक पर्यावरणीय स्वीकृति आवश्यक नहीं थी। लेकिन, तय सीमा से अधिक खनन गंभीर है।
पीठ ने साल 2024 में कंपनी पर 1.29 करोड़ का जुर्माना लगाया गया। जिसे कंपनी ने जमा कर दिया गया। वहीं उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (यूपीपीसीबी) ने साल 2025 में 2.76 करोड़ रुपये की पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति निर्धारित की, जिसे भी परियोजना प्राधिकरण ने जमा कर दिया। एनजीटी ने कहा कि जुर्माना व क्षतिपूर्ति की राशि जमा होने और सुधारात्मक कदम उठाए जाने के बाद अब मामले में आगे कार्रवाई की आवश्यकता नहीं है।