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Jhansi News: पाकिस्तान को दिया था मुंहतोड़ जवाब, देश के लिए अब भी लड़ने को तैयार
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अमर उजाला ब्यूरो
झांसी। भारत और पाकिस्तान के बीच 25 साल पहले सन 1999 में हुए कारगिल युद्ध में झांसी के रणबांकुरों ने भी अदम्य साहस का परिचय दिया था। जान की परवाह किए बगैर उन्होंने पाकिस्तान की दगाबाजी का मुंहतोड़ जवाब दिया था। कारगिल विजय दिवस पर वीरों ने अमर उजाला से युद्ध के मंजर के अपने अनुभव साझा किए। कहा कि अब वह सेना का हिस्सा भले नहीं हैं, लेकिन देश की खातिर भारत ही नहीं, बल्कि दुनिया के किसी भी कोने में जाकर लड़ने को तैयार हैं।
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धमाकों की आवाज से चली गई थी श्रवण शक्ति
करगुवांजी डिफेंस कॉलोनी में रह रहे सेवानिवृत्त सूबेदार मेजर जगत नारायण शर्मा कारगिल युद्ध के दौरान लेह में तैनात थे। जंग शुरू होते ही उन्हें टीम के साथ युद्ध भूमि में भेज दिया गया था। उनके कंधों पर सैनिकों के हथियारों को दुरुस्त रखने की जिम्मेदारी थी। युद्ध लंबा खिंचने के साथ उनकी जिम्मेदारी भी बढ़ती गई। सैनिकों को रसद पहुंचाना हो या बलिदान सैनिकों के शवों को उनके घर भेजना हो, यह सब काम भी उन्हें अपनी टीम के साथ देखना पड़ रहा था। दिन हो या रात हर समय उन्हें मुस्तैद रहना पड़ता था। तोप के गोलों के धमाकों से उनकी श्रवण शक्ति भी चली गई थी। बावजूद, वह डटे रहे। जगत नारायण ने बताया कि उस समय न खुद की चिंता रहती थी, न परिवार की। बस एक ही बात जेहन में रहती थी कि पाकिस्तान को हराना है और इसी हौसले के साथ भारतीय सेना परिस्थितियां विपरीत होने के बाद भी जीतने में कामयाब रही।
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थमने नहीं दिए युद्धक वाहनों के पहिये
राजगढ़ के विकास नगर निवासी सेवानिवृत्त नायब सूबेदार राजकुमार सिंह भदौरिया सेना की ईएमई शाखा में पट्टन में तैनात थे। उन्होंने बताया कि उन पर युद्धक वाहनों को दुरुस्त रखने की जिम्मेदारी थी। इसके लिए वाहनों के साथ उन्हें जंग के मैदान में तैनात रहना पड़ता था। इलाका चारों ओर से पहाड़ियों से घिरा हुआ था। पाकिस्तानी फौज ऊंचाई पर थी, जबकि भारतीय सेना नीचे थी, ऐसे में चुनौती ज्यादा थी। धमाका होते ही पहाड़ों के पत्थर दरक कर नीचे की ओर गिरने लगते थे, जिनसे खुद को बचाना बड़ी चुनौती होती थी। इसके अलावा तोप के गोलों की बारिश लगातार जारी रहती थी। राजकुमार सिंह ने बताया कि कठिन परिस्थितियां होने के बाद भी उनकी टीम ने युद्धक वाहनों के पहिये नहीं थमने दिए और उन्हें पहाड़ों की ऊंची-ऊंची चोटियों पर लेकर गए।
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युद्ध के लिए नेवी भी हो गई थी तैयार
विशिष्ट सेवा पदक प्राप्त नेवी से सेवानिवृत्त कमोडोर विजय शंकर बबेले कारगिल युद्ध के दौरान आईएनएस विराट पर तैनात थे। उन्होंने बताया कि कारगिल जंग शुरू होते ही नेवी भी युद्ध के लिए तैयार हो गई थी। समुद्री सीमाओं की निगरानी बढ़ा दी गई थी और चौबीसों घंटे सघन गश्त जारी रहती थी। युद्ध पोत पर तैनात फाइटर विमान में हर समय मुस्तैद रहते थे। हमले की स्थिति में चंद पलों में वे दुश्मन को मुंहतोड़ जवाब देने की स्थिति में थे। उन्होंने कहा कि केवल सैनिकों के लिए ही नहीं, बल्कि हर नागरिक के लिए देश हमेशा सर्वोपरि होना चाहिए।
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बलिदानियों को आज दी जाएगी श्रद्धांजलि
कारगिल युद्ध के बलिदानियों को शुक्रवार को अमर उजाला की ओर से श्रद्धांजलि अर्पित की जाएगी। सीपरी बाजार स्थित कारगिल शहीद पार्क में शाम पांच बलिदानियों को याद कर दीपक और मोमबत्तियां जलाई जाएंगी। श्रद्धांजलि सभा का आयोजन शाम पांच बजे होगा, जिसमें समाज के सभी वर्गों की सहभागिता रहेगी।
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झांसी। भारत और पाकिस्तान के बीच 25 साल पहले सन 1999 में हुए कारगिल युद्ध में झांसी के रणबांकुरों ने भी अदम्य साहस का परिचय दिया था। जान की परवाह किए बगैर उन्होंने पाकिस्तान की दगाबाजी का मुंहतोड़ जवाब दिया था। कारगिल विजय दिवस पर वीरों ने अमर उजाला से युद्ध के मंजर के अपने अनुभव साझा किए। कहा कि अब वह सेना का हिस्सा भले नहीं हैं, लेकिन देश की खातिर भारत ही नहीं, बल्कि दुनिया के किसी भी कोने में जाकर लड़ने को तैयार हैं।
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धमाकों की आवाज से चली गई थी श्रवण शक्ति
करगुवांजी डिफेंस कॉलोनी में रह रहे सेवानिवृत्त सूबेदार मेजर जगत नारायण शर्मा कारगिल युद्ध के दौरान लेह में तैनात थे। जंग शुरू होते ही उन्हें टीम के साथ युद्ध भूमि में भेज दिया गया था। उनके कंधों पर सैनिकों के हथियारों को दुरुस्त रखने की जिम्मेदारी थी। युद्ध लंबा खिंचने के साथ उनकी जिम्मेदारी भी बढ़ती गई। सैनिकों को रसद पहुंचाना हो या बलिदान सैनिकों के शवों को उनके घर भेजना हो, यह सब काम भी उन्हें अपनी टीम के साथ देखना पड़ रहा था। दिन हो या रात हर समय उन्हें मुस्तैद रहना पड़ता था। तोप के गोलों के धमाकों से उनकी श्रवण शक्ति भी चली गई थी। बावजूद, वह डटे रहे। जगत नारायण ने बताया कि उस समय न खुद की चिंता रहती थी, न परिवार की। बस एक ही बात जेहन में रहती थी कि पाकिस्तान को हराना है और इसी हौसले के साथ भारतीय सेना परिस्थितियां विपरीत होने के बाद भी जीतने में कामयाब रही।
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थमने नहीं दिए युद्धक वाहनों के पहिये
राजगढ़ के विकास नगर निवासी सेवानिवृत्त नायब सूबेदार राजकुमार सिंह भदौरिया सेना की ईएमई शाखा में पट्टन में तैनात थे। उन्होंने बताया कि उन पर युद्धक वाहनों को दुरुस्त रखने की जिम्मेदारी थी। इसके लिए वाहनों के साथ उन्हें जंग के मैदान में तैनात रहना पड़ता था। इलाका चारों ओर से पहाड़ियों से घिरा हुआ था। पाकिस्तानी फौज ऊंचाई पर थी, जबकि भारतीय सेना नीचे थी, ऐसे में चुनौती ज्यादा थी। धमाका होते ही पहाड़ों के पत्थर दरक कर नीचे की ओर गिरने लगते थे, जिनसे खुद को बचाना बड़ी चुनौती होती थी। इसके अलावा तोप के गोलों की बारिश लगातार जारी रहती थी। राजकुमार सिंह ने बताया कि कठिन परिस्थितियां होने के बाद भी उनकी टीम ने युद्धक वाहनों के पहिये नहीं थमने दिए और उन्हें पहाड़ों की ऊंची-ऊंची चोटियों पर लेकर गए।
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युद्ध के लिए नेवी भी हो गई थी तैयार
विशिष्ट सेवा पदक प्राप्त नेवी से सेवानिवृत्त कमोडोर विजय शंकर बबेले कारगिल युद्ध के दौरान आईएनएस विराट पर तैनात थे। उन्होंने बताया कि कारगिल जंग शुरू होते ही नेवी भी युद्ध के लिए तैयार हो गई थी। समुद्री सीमाओं की निगरानी बढ़ा दी गई थी और चौबीसों घंटे सघन गश्त जारी रहती थी। युद्ध पोत पर तैनात फाइटर विमान में हर समय मुस्तैद रहते थे। हमले की स्थिति में चंद पलों में वे दुश्मन को मुंहतोड़ जवाब देने की स्थिति में थे। उन्होंने कहा कि केवल सैनिकों के लिए ही नहीं, बल्कि हर नागरिक के लिए देश हमेशा सर्वोपरि होना चाहिए।
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बलिदानियों को आज दी जाएगी श्रद्धांजलि
कारगिल युद्ध के बलिदानियों को शुक्रवार को अमर उजाला की ओर से श्रद्धांजलि अर्पित की जाएगी। सीपरी बाजार स्थित कारगिल शहीद पार्क में शाम पांच बलिदानियों को याद कर दीपक और मोमबत्तियां जलाई जाएंगी। श्रद्धांजलि सभा का आयोजन शाम पांच बजे होगा, जिसमें समाज के सभी वर्गों की सहभागिता रहेगी।