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युद्ध का असर: 30-40% पर सिमटा प्लास्टिक-चमड़ा कारोबार, कच्चा माल महंगा होने उद्योगों पर संकट, पढ़ें रिपोर्ट

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कानपुर Published by: Himanshu Awasthi Updated Wed, 18 Mar 2026 10:30 AM IST
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सार

Kanpur News: वैश्विक युद्ध के चलते कानपुर के प्रमुख उद्योगों में कच्चे माल की भारी कमी और लॉजिस्टिक लागत में बेतहाशा वृद्धि हुई है। सीजन के समय उत्पादन गिरने से कारोबारियों का भुगतान फंस गया है और आम जरूरत की चीजें महंगी हो रही हैं।

Kanpur Plastic and Leather Industries Contract to 30–40% Capacity Rising Raw Material Costs Trigger Crisis
यादवेंद्र सचान, सुनील वैश्य और वीरेंद्र गुलाटी - फोटो : amar ujala
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विस्तार

अमेरिका, इस्राइल और ईरान के बीच चल रहा युद्ध लगातार बढ़ता ही जा रहा है। युद्ध से चमड़ा, केमिकल, कपड़ा, प्लास्टिक उद्योग पर गहरा संकट पड़ चुका है। प्लास्टिक से जुड़ा हर कच्चा माल महंगा होने से इससे जुड़ी हर चीज महंगी हो गई है। आयात वस्तुओं के दाम बढ़ने से स्थितियां बिगड़ रही हैं। इकाइयों का भुगतान भी रुकने लगा है। कारोबारियों का कहना है कि अब प्लास्टिक उद्योग कारोबार केवल 30 प्रतिशत और चमड़ा उद्योग का उत्पादन 40 प्रतिशत पर सिमट गया है।

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शहर के कपड़ा, रेडीमेड और होजरी पर भी युद्ध का असर आ चुका है। पेट्रोलियम पदार्थ पर निर्भर उद्योग प्लास्टिक, रसायन कारोबार पर आने वाले समय में और महंगाई बढ़ने की संभावना है। इसका सीधा असर आम आदमी पर पड़ेगा। निर्यातकों के सामने और बड़ी समस्या हो गई है। शिपिंग कंपनियों ने मालभाड़ा और समुद्र जोखिम बीमा तीन से चार गुना पहले ही कर दिया है, जो आगे और बढ़ सकता है। इसके अलावा कच्चा माल महंगा होने से उत्पादों की कीमतों में इजाफा हो गया है।

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प्लास्टिक उद्योग पर संकट सबसे ज्यादा
आवश्यक वस्तु अधिनियम लागू होने से कानपुर, कानपुर देहात के प्लास्टिक उद्योग पर संकट सबसे ज्यादा है। कानपुर, उन्नाव, कानपुर देहात के रनियां में चमड़ा उद्योग का बड़ा कारोबार है। 250 के करीब टेनरियां और जूतों की फैक्टरी हैं। इन सभी जगहों पर उत्पादन धीमा हो गया है। फेडरेशन ऑफ इंडियन एक्सपोर्ट ऑर्गनाइजेशन (फियो) के संयोजक आलोक श्रीवास्तव ने बताया कि उत्पादों की लॉजिस्टिक कास्ट बढ़ने से कानपुर में आयातित होने वाले उत्पाद व वस्तुओं के दाम बढ़ गए हैं।

कच्चे माल की कमी और कीमतों में वृद्धि का असर
युद्धग्रस्त देशों के अलावा यूरोप, अमेरिका से शहर में ऊर्जा और पेट्रोलियम उत्पाद, धातु और निर्माण सामग्री, एल्युमीनियम, स्टील और लोहे के उत्पाद, जिप्सम, कीमती धातु और पत्थर, सोना, चांदी, हीरे, केमिकल उत्पाद, क्रोमियम, सल्फर, डाई आदि का आयात किया जाता है। इन पर भी तेज असर पड़ रहा है। कच्चे माल की कमी और कीमतों में वृद्धि का सीधा असर प्लास्टिक उद्योग पर पड़ेगा। इसके चलते पैकेजिंग सामग्री से लेकर आम लोगों के रोजमर्रा में महंगी हो गई हैं।

फरवरी से मई तक का समय सबसे ज्यादा अहम
कारोबारियों ने बताया कि फरवरी से मई तक का समय औद्योगिक इकाइयों के लिए सबसे ज्यादा अहम होता है। फरवरी में होली पड़ती है। इसी महीने या अगले महीने ईद मनाई जाती है। वित्तीय वर्ष मार्च में सभी जगह क्लोजिंग होती है। इसके अलावा गेहूं की कटाई मार्च-अप्रैल में होती है। इसके अलावा इन दिनों ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में बड़े स्तर पर शादी समारोह होते हैं। इससे उद्योगों में इस अवधि में सबसे ज्यादा मांग होती है। सभी औद्योगिक इकाइयां बड़े स्तर पर उत्पादन करती हैं लेकिन युद्ध से सभी उद्योगों में प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है।

युद्ध लगातार बढ़ता जा रहा है। भुगतान फंस रहे हैं। केमिकल और लेदर फैक्टरियों के उत्पादन खर्च बढ़ रहे हैं। आयातित कच्चा माल देर से पहुंच रहा है। उत्पादन में देरी और लागत में वृद्धि हो रही है। कारोबार 40 प्रतिशत ही रह गया है। इस्राइल, जीसीसी देशों में निर्यात बुरी तरह प्रभावित हो चुका है। आने वाला समय बेहद चुनौतीपूर्ण है।  -यादवेंद्र सचान, क्षेत्रीय अध्यक्ष, चर्म निर्यात परिषद

मार्च, अप्रैल और मई का समय एमएसएमई के अलावा सभी उद्योगों के लिए उत्पादन का सबसे पीक समय होता है। 28 फरवरी से युद्ध शुरू हुआ था जो लगातार बढ़ता जा रहा है। प्लास्टिक उद्योग केवल 30 प्रतिशत ही बचा है। 70 प्रतिशत कारोबार ठप हो गया है। चमड़ा, केमिकल, गारमेंट, उद्योग के लिए भी संकट का समय है।  -सुनील वैश्य, पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष, आईआईए

ईद का त्योहार बेहद नजदीक है। युद्ध का असर कपड़ा उद्योग पर भी है। पॉलिस्टर यार्न धागा, पॉलिस्टर फाइबर के दाम में 15 प्रतिशत की तेजी आ गई है। जो यार्न पहले 140 रुपये प्रति किलो तक था, अब 160-165 रुपये किलो तक हो गया है। कच्चा माल महंगा हो गया है। इससे तैयार उत्पाद भी महंगे हो गए हैं।  -वीरेंद्र गुलाटी, अध्यक्ष, कानपुर कपड़ा कमेटी

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