ध्यान दें: हॉरर रील के शौक से डरावने सपनों का खौफ, ब्लू लाइट से टूट रहा स्लीप साइकिल, GSVM डॉक्टरों की चेतावनी
Kanpur News: जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज की रिपोर्ट के अनुसार, रील की लत किशोरों के निद्रा चक्र और मानसिक संतुलन को बिगाड़ रही है। इससे उनमें डरावने सपने, उग्रता और याददाश्त की कमी जैसी समस्याएं आ रही हैं।
विस्तार
रील की लत किशोरों की रियल लाइफ पर असर डाल रही है। उन्हें रात में डरावने सपने (नाइटमेयर) आते हैं। साथ ही निद्रा चक्र प्रभावित हो गया है। ऐसे किशोरों और युवाओं में आत्मविश्वास घट जा रहा है। पढ़ाई भी प्रभावित हो रही है। अभिभावक किशोरों को लेकर मनोरोग विभाग की किशोरावस्था क्लीनिक में आ रहे हैं। मेडिकल कॉलेज के एडोलेसेंट क्लीनिक में आए किशोरों की हिस्ट्री से पता चला है कि जिनको डरावने सपने आ रहे हैं, वे हॉरर रील अधिक देखते हैं।
घर वालों ने बताया कि वे सोते-सोते चौंककर उठ जाते हैं। इसके अलावा सोने के दौरान उठकर चल पड़ते हैं। इससे गिरने का डर रहता है। जब होश आता है तो उन्हें कुछ पता नहीं रहता। परीक्षाओं में ये फेल जाते हैं या फिर बहुत कम अंक पा रहे हैं। ऐसे किशोरों की याददाश्त भी प्रभावित हुई है। किसी काम को लेकर उनमें आत्मविश्वास नहीं रहता। घर वालों के कुछ कहने पर उग्र बर्ताव करने लगते हैं।
रील का कंटेंट मनोदशा को करता है प्रभावित
जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज के मनोरोग के प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष डॉ धनंजय चौधरी ने बताया कि मोबाइल स्क्रीन से निकलने वाली नीली रोशनी न्यूरो केमिकल का संतुलन बिगाड़ती है। इससे निद्रा चक्र टूटता है। इसके अलावा रील का कंटेंट मनोदशा को प्रभावित करता है। इससे नाइटमेयर आने लगते हैं। इसका असर दिलो-दिमाग पर बना रहता है। इसके दुष्प्रभाव आने लगते हैं। इसकी वजह से साइकोलॉजिकल डिसऑर्गेनाइजेशन होने लगता है।
कमरे में बल्ब जलाकर सोते हैं
विभाग की चाइल्ड एवं एडोलेसेंट विशेषज्ञ डॉ. कृतिका चावला का कहना है कि बच्चों के बदले व्यवहार से घर वाले परेशान रहते हैं। पढ़ाई पर इसका बुरा असर पड़ रहा है। बहुत से बच्चे नाइटमेयर की वजह से सोते वक्त डरते हैं। कमरे में बल्ब जलाकर सोते हैं। इसका दुष्प्रभाव उनकी मानसिकता पर आ रहा है। रील वाली जिंदगी रियल्टी में पाने के चक्कर में अवसाद की स्थिति पैदा हो जाती है।
इन बातों का रखें ध्यान
- बच्चों को सोने के पहले फोन न देखने दें।
- रात में सोने जाएं तो उनसे फोन ले लें।
- यह निगरानी करते रहें कि बच्चे क्या देखते हैं।
- माता-पिता अपनी फोन देखने की आदत पर लगाम लगाएं।
- बच्चों को बाहर मैदान में दोस्तों के साथ खेलने भेजें।
- घर वाले संवेदनशीलता के साथ बच्चों से बात करें।