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Kasganj News: साइलेंट विजन किलर’ बन रहा काला मोतियाबिंद
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फोटो 01़ कासगंज जिला अस्पताल में चिकित्सक नेत्ररोगी का परीक्षण करते। स्रोत: संवाद
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कासगंज। हमारी आंखें सिर्फ देखने का साधन नहीं, बल्कि दुनिया के रंगों और भावनाओं को महसूस करने का सबसे अहम जरिया हैं। लेकिन आंखों से जुड़ी एक खामोश और खतरनाक बीमारी धीरे-धीरे लोगों की रोशनी छीन रही है। काला मोतियाबिंद, जिसे चिकित्सा भाषा में ग्लूकोमा कहा जाता है, इन दिनों साइलेंट विजन किलर के रूप में सामने आ रहा है। यह बीमारी बिना ज्यादा संकेत दिए धीरे-धीरे आंखों की रोशनी को नुकसान पहुंचाती है और कई बार मरीज को तब पता चलता है, जब नुकसान काफी हो चुका होता है।
नेत्र रोग विशेषज्ञ सीएमएस डॉ. संजीव सक्सेना के अनुसार आंख के अंदर अंगों को पोषण देने के लिए एक तरल पदार्थ होता है। सामान्य स्थिति में यह तरल पदार्थ आंख के बेहद महीन छिद्रों के माध्यम से बाहर निकलता रहता है।
लेकिन उम्र बढ़ने के साथ यह छिद्र संकरे होने लगते हैं, जिससे तरल पदार्थ का निकलना बाधित हो जाता है। इसके कारण आंख के भीतर दबाव (आई प्रेशर) बढ़ने लगता है। यह बढ़ा हुआ दबाव आंख से दिमाग तक संकेत पहुंचाने वाली ऑप्टिक नर्व को नुकसान पहुंचाता है।
ऑप्टिक नर्व बेहद संवेदनशील होती है। ज्यादा दबाव पड़ने पर यह प्रभावित हो जाती है और धीरे-धीरे दृष्टि कमजोर होने लगती है। सबसे गंभीर बात यह है कि यदि एक बार आंख की रोशनी चली जाए तो उसे वापस पाना लगभग असंभव होता है। जिला अस्पताल में हर महीने करीब 25 मरीज काला मोतियाबिंद की समस्या लेकर पहुंच रहे हैं, जो इस बात का संकेत है कि लोगों में इस बीमारी के प्रति जागरूकता अभी भी कम है। कई लोग शुरुआती लक्षणों को नजरअंदाज कर देते हैं।
किन लोगों को अधिक खतरा
-जिनके परिवार में किसी सदस्य को यह बीमारी रही हो
-लंबे समय तक स्टेरॉयड दवाओं का सेवन करने वाले
-मधुमेह, हृदय रोग, माइग्रेन, सिकल सेल एनीमिया या उच्च रक्तचाप के मरीज
-जिनकी आंखों का माइनस नंबर बार-बार बदलता या कम होता रहता है
-40 वर्ष से अधिक उम्र के लोग
-जिनकी आंख में कभी चोट लगी हो या कोई सर्जरी हुई हो
ये हैं शुरुआती लक्षण
-धुंधला दिखाई देना
-आंखों के सामने रंगीन बुलबुले या घेरों का दिखना
-चश्मा लगाने के बाद भी साफ न दिखना
-सिर का लगातार भारी रहना
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नेत्र रोग विशेषज्ञ सीएमएस डॉ. संजीव सक्सेना के अनुसार आंख के अंदर अंगों को पोषण देने के लिए एक तरल पदार्थ होता है। सामान्य स्थिति में यह तरल पदार्थ आंख के बेहद महीन छिद्रों के माध्यम से बाहर निकलता रहता है।
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लेकिन उम्र बढ़ने के साथ यह छिद्र संकरे होने लगते हैं, जिससे तरल पदार्थ का निकलना बाधित हो जाता है। इसके कारण आंख के भीतर दबाव (आई प्रेशर) बढ़ने लगता है। यह बढ़ा हुआ दबाव आंख से दिमाग तक संकेत पहुंचाने वाली ऑप्टिक नर्व को नुकसान पहुंचाता है।
ऑप्टिक नर्व बेहद संवेदनशील होती है। ज्यादा दबाव पड़ने पर यह प्रभावित हो जाती है और धीरे-धीरे दृष्टि कमजोर होने लगती है। सबसे गंभीर बात यह है कि यदि एक बार आंख की रोशनी चली जाए तो उसे वापस पाना लगभग असंभव होता है। जिला अस्पताल में हर महीने करीब 25 मरीज काला मोतियाबिंद की समस्या लेकर पहुंच रहे हैं, जो इस बात का संकेत है कि लोगों में इस बीमारी के प्रति जागरूकता अभी भी कम है। कई लोग शुरुआती लक्षणों को नजरअंदाज कर देते हैं।
किन लोगों को अधिक खतरा
-जिनके परिवार में किसी सदस्य को यह बीमारी रही हो
-लंबे समय तक स्टेरॉयड दवाओं का सेवन करने वाले
-मधुमेह, हृदय रोग, माइग्रेन, सिकल सेल एनीमिया या उच्च रक्तचाप के मरीज
-जिनकी आंखों का माइनस नंबर बार-बार बदलता या कम होता रहता है
-40 वर्ष से अधिक उम्र के लोग
-जिनकी आंख में कभी चोट लगी हो या कोई सर्जरी हुई हो
ये हैं शुरुआती लक्षण
-धुंधला दिखाई देना
-आंखों के सामने रंगीन बुलबुले या घेरों का दिखना
-चश्मा लगाने के बाद भी साफ न दिखना
-सिर का लगातार भारी रहना