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Kushinagar News: निजी प्रकाशकन की किताबें जरूरी करने से अभिभावक परेशान
संवाद न्यूज एजेंसी, कुशीनगर
Updated Sun, 05 Apr 2026 02:21 AM IST
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पडरौना। नए शैक्षणिक सत्र की शुरुआत के साथ ही निजी स्कूलों में किताबों के नाम पर अभिभावकों पर आर्थिक बोझ बढ़ गया है। आरोप है कि कई स्कूलों ने एनसीईआरटी की सस्ती किताबों के साथ निजी प्रकाशकों की महंगी किताबें भी अनिवार्य कर दी हैं। अभिभावक को उन्हें खरीदने के लिए मजबूर हैं।
निजी स्कूलों की तरफ से जारी किताबों की सूची के अनुसार, कक्षा छह से आठवीं तक अंग्रेजी, हिंदी और गणित जैसे विषयों में एनसीईआरटी के साथ निजी प्रकाशकों की किताबें भी लगाई गई हैं। जहां एनसीईआरटी की एक किताब लगभग 60-65 रुपये में मिल जाती है, वहीं निजी प्रकाशकों की वही किताब 300 से 700 रुपये तक में मिल रही है। इससे अभिभावकों की जेब पर अतिरिक्त बोझ पड़ रहा है।
अभिभावकों का कहना है। स्कूलों ने पहले से ही बुक स्टॉल तय कर रखे हैं, जहां से ही किताबें खरीदने पड़ते हैं। इन दुकानों पर किताबों की खरीदारी करने पर किसी प्रकार की छूट भी नहीं मिलती है। एक ही कक्षा की किताबों के दाम में अलग-अलग स्कूलों में 1500 से 3000 रुपये तक का अंतर देखा जा रहा है। नए सत्र के साथ किताबें, यूनिफॉर्म, बैग और फीस मिलाकर प्रति छात्र करीब 30 से 35 हजार रुपये तक खर्च आ रहा है। ऐसे में जिन परिवारों में दो बच्चे हैं, उन्हें एक ही समय में 60 से 70 हजार रुपये की व्यवस्था करनी पड़ रही है।
अभिभावकों का कहना है कि शिक्षा विभाग इस मामले में हस्तक्षेप कर निजी स्कूलों की मनमानी पर रोक लगाए और किताबों की कीमतों नियंत्रित किया जाए, ताकि अभिभावकों को राहत मिल सके। इससे अभिभावकों पर ज्यादा भार पड़ता है। इससे राहत दिलाई जाए। शिक्षा विभाग के अधिकारियों को इस तरफ ध्यान देना चाहिए। सबसे पहले कोर्स खरीदने के लिए छूट मिलनी चाहिए। एक ही दुकान पर बाध्यता नहीं होनी चाहिए। संवाद
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निजी स्कूलों की तरफ से जारी किताबों की सूची के अनुसार, कक्षा छह से आठवीं तक अंग्रेजी, हिंदी और गणित जैसे विषयों में एनसीईआरटी के साथ निजी प्रकाशकों की किताबें भी लगाई गई हैं। जहां एनसीईआरटी की एक किताब लगभग 60-65 रुपये में मिल जाती है, वहीं निजी प्रकाशकों की वही किताब 300 से 700 रुपये तक में मिल रही है। इससे अभिभावकों की जेब पर अतिरिक्त बोझ पड़ रहा है।
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अभिभावकों का कहना है। स्कूलों ने पहले से ही बुक स्टॉल तय कर रखे हैं, जहां से ही किताबें खरीदने पड़ते हैं। इन दुकानों पर किताबों की खरीदारी करने पर किसी प्रकार की छूट भी नहीं मिलती है। एक ही कक्षा की किताबों के दाम में अलग-अलग स्कूलों में 1500 से 3000 रुपये तक का अंतर देखा जा रहा है। नए सत्र के साथ किताबें, यूनिफॉर्म, बैग और फीस मिलाकर प्रति छात्र करीब 30 से 35 हजार रुपये तक खर्च आ रहा है। ऐसे में जिन परिवारों में दो बच्चे हैं, उन्हें एक ही समय में 60 से 70 हजार रुपये की व्यवस्था करनी पड़ रही है।
अभिभावकों का कहना है कि शिक्षा विभाग इस मामले में हस्तक्षेप कर निजी स्कूलों की मनमानी पर रोक लगाए और किताबों की कीमतों नियंत्रित किया जाए, ताकि अभिभावकों को राहत मिल सके। इससे अभिभावकों पर ज्यादा भार पड़ता है। इससे राहत दिलाई जाए। शिक्षा विभाग के अधिकारियों को इस तरफ ध्यान देना चाहिए। सबसे पहले कोर्स खरीदने के लिए छूट मिलनी चाहिए। एक ही दुकान पर बाध्यता नहीं होनी चाहिए। संवाद