War: युद्ध की तपिश से झुलस रहा देश का निर्यात कारोबार, 40 से 45 हजार कंटेनर बीच राह अटके, आर्थिक मार का खतरा
पश्चिम एशिया में युद्ध के कारण भारत का निर्यात प्रभावित हो रहा है। मुरादाबाद का पीतल हस्तशिल्प और पश्चिमी यूपी का चावल निर्यात बुरी तरह प्रभावित होने लगा है। करीब 40-45 हजार कंटेनर रास्ते में फंसने से लागत पांच गुना तक बढ़ गई है।
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पश्चिम एशिया युद्ध की तपिश से भारतीय निर्यात झुलसने लगा है। मुरादाबाद का पीतल हस्तशिल्प ही नहीं, चावल निर्यात भी बुरी तरह प्रभावित है। मुरादाबाद के अलावा नजदीकी जिलों और पूरे पश्चिमी उत्तर प्रदेश से बड़ी मात्रा में चावल विदेशों में निर्यात किया जाता है।
युद्ध से प्रभावित देशों में भारतीय चावल और मुरादाबाद-संभल के हस्तशिल्प उत्पादों की खासी मांग रहती है। जानकार बताते हैं कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर माहौल प्रभावित होने से अब तक देश का करीब दो हजार करोड़ रुपये का निर्यात प्रभावित हो चुका है।
दरअसल भारत से सऊदी अरब सहित सभी मध्य पूर्व देशों में जाने वाला माल रास्ते में फंस गया है। शिपिंग कंपनियों के माध्यम से जाने वाले कंटेनर निकल नहीं पा रहे। अनुमान है कि करीब 40 से 45 हजार कंटेनर रास्ते में अटक गए हैं। इससे निर्यात लागत में करीब पांच गुना का इजाफा हो गया है।
शिपिंग कंपनियों द्वारा फंसे माल का अतिरिक्त चार्ज मांगने या कंटेनर खाली करने की शर्त रखी जा रही है। इससे निर्यातकों व उद्यमियों पर और बड़ी आर्थिक मार का खतरा बढ़ गया है। जानकार बताते हैं कि भारत से दुनिया के करीब 137 देशों को बासमती चावल का निर्यात होता है।
लगभग सौ से अधिक देशों में मुरादाबाद के पीतल व मेटल उत्पाद, संभल के हड्डी-सींग व लकड़ी उत्पादों की भी सप्लाई है। चावल के मामले में पश्चिमी यूपी ही नहीं हरियाणा, पंजाब सहित कई राज्य इन दिनों प्रभावित हैं। निर्यातकों का कहना है कि जल्द हालात नहीं सुधरे तो मुरादाबाद समेत पश्चिमी यूपी और कई राज्यों की निर्यात चेन और बुरी तरह प्रभावित होगी।
एक मार्च से ही दुनिया के किसी भी देश में भारतीय चावल नहीं जा पा रहा है। इस समय करीब दो लाख टन बासमती चावल जिसकी कीमत करीब 1700-1800 करोड़ रुपये है, विभिन्न बंदरगाहों व रास्ते में फंसा है। इंडिया के पोर्ट पर भी करीब दो लाख टन चावल पड़ा है, जिसे विभिन्न देशों में भेजा जाना था। इसके चलते अतिरिक्त और भारी लागत की मार की आशंका है। हालांकि सरकार ने प्रयासों का भरोसा दिया है। -सतीश गोयल, प्रधान ऑल इंडिया राइस एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन
एक मोटे अनुमान के मुताबिक पश्चिम एशिया युद्ध के कारण 45000 कंटेनर अंतरराष्ट्रीय बंदरगाहों और ट्रांजिट मार्गों में फंसे हुए हैं। इससे निर्यात लागत में भारी वृद्धि हुई है। साथ ही सप्लाई की चेन प्रभावित है। सामान्य दिनों में 800 से 1500 डॉलर प्रति कंटेनर का खर्च आता था। अब 3000 से 5000 डॉलर तक अतिरिक्त सरचार्ज झेलना पड़ रहा है। मुद्दा केवल लागत बढ़ने का नहीं है, बल्कि भारत की वैश्विक विश्वसनीयता और समयबद्ध आपूर्ति क्षमता पर भी असर है। हमारे कई निर्यातक विशेषकर एमएसएमई सेक्टर वाले उद्यमी भारी दबाव में हैं। सरकार और शिपिंग लाइनों से राहत उपायों की अपेक्षा है। - नवेद उर रहमान, अध्यक्ष मेटल हैंडीक्राफ्ट एक्सपोर्ट एसोसिएशन
