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Shamli News: जिले के 27 पशु चिकित्सालयों में सिर्फ 11 डॉक्टर
संवाद न्यूज एजेंसी, शामली
Updated Fri, 19 Jun 2026 12:54 AM IST
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ऊन के पशु चिकित्सालय में उगी घास। संवाद
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ऊन। जिले में पशुपालकों को बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं देने के लिए स्थापित पशु चिकित्सालय संसाधनों और स्टाफ की भारी कमी से जूझ रहे हैं। हालात यह हैं कि 27 पशु चिकित्सालयों में मात्र 11 पशु चिकित्सक और 14 फार्मासिस्ट ही कार्यरत हैं, जबकि बाकी केंद्र या तो बंद पड़े हैं या फिर एक ही डॉक्टर कई-कई केंद्रों का अतिरिक्त प्रभार संभाल रहे हैं। वर्तमान में एक-एक डॉक्टर पर कई अस्पतालों और गोशालाओं की जिम्मेदारी है। ऐसे में कहीं सुबह ओपीडी, तो कहीं टीकाकरण और निरीक्षण के बीच डॉक्टर व्यस्त है, जिससे पशुओं को समय पर उपचार मिलना मुश्किल हो रहा है।
कई केंद्र वर्षों से डॉक्टर विहीन
ऊन, कांधला और झिंझाना ब्लॉक के कई पशु चिकित्सालयों में वर्षों से डॉक्टर की तैनाती नहीं हुई है। भवन और संसाधन मौजूद होने के बावजूद चिकित्सक न होने से स्वास्थ्य सेवाएं ठप पड़ी हैं। पशुपालकों को अब निजी डॉक्टरों पर निर्भर रहना पड़ रहा है।
बीमारियां लील रही पशु
दूध उत्पादन और पशुपालन पर आधारित ग्रामीण अर्थव्यवस्था वाले जिले में खुरपका-मुंहपका, एफएमडी और गलघोंटू जैसी बीमारियों का समय पर इलाज न होने से पशु दम तोड़ रहे है। वहीं हाल ही में दथेड़ा गोशाला में समय पर इलाज न मिलने से हाल ही में तीन गोवंशों की मौत ने व्यवस्था की पोल खोल दी है। लोगों का आरोप है कि यदि समय पर चिकित्सक उपलब्ध होते तो पशुओं की जान बचाई जा सकती थी।
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पशुपालकों की पीड़ा
पशुपालक रामकुमार पांचाल ने बताया कि कई वर्षों से पशु चिकित्सालय में डॉक्टर नहीं है, जिसके चलते बीमार पशुओं का इलाज निजी डॉक्टरों से कराना पड़ता है।
किसान संजीव चौधरी का कहना है कि करीब पांच वर्षों से चिकित्सालय में डॉक्टर की नियुक्ति नहीं हुई, जिससे काफी परेशानी होती है।
समाजसेवी जगमेर शर्मा ने बताया कि कई बार उच्च अधिकारियों से गुहार लगाने के बावजूद स्थिति जस की तस बनी हुई है।
रिक्त पदों की सूचना शासन को भेजी जा चुकी है। संविदा नियुक्ति की प्रक्रिया जारी है तथा पशु मेलों, टीकाकरण शिविरों और मोबाइल वेटरिनरी यूनिट के माध्यम से सेवाएं दी जा रही हैं। - डॉ. चंद्रभानु कश्यप, मुख्य पशु चिकित्सा अधिकारी
कई केंद्र वर्षों से डॉक्टर विहीन
ऊन, कांधला और झिंझाना ब्लॉक के कई पशु चिकित्सालयों में वर्षों से डॉक्टर की तैनाती नहीं हुई है। भवन और संसाधन मौजूद होने के बावजूद चिकित्सक न होने से स्वास्थ्य सेवाएं ठप पड़ी हैं। पशुपालकों को अब निजी डॉक्टरों पर निर्भर रहना पड़ रहा है।
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बीमारियां लील रही पशु
दूध उत्पादन और पशुपालन पर आधारित ग्रामीण अर्थव्यवस्था वाले जिले में खुरपका-मुंहपका, एफएमडी और गलघोंटू जैसी बीमारियों का समय पर इलाज न होने से पशु दम तोड़ रहे है। वहीं हाल ही में दथेड़ा गोशाला में समय पर इलाज न मिलने से हाल ही में तीन गोवंशों की मौत ने व्यवस्था की पोल खोल दी है। लोगों का आरोप है कि यदि समय पर चिकित्सक उपलब्ध होते तो पशुओं की जान बचाई जा सकती थी।
पशुपालकों की पीड़ा
पशुपालक रामकुमार पांचाल ने बताया कि कई वर्षों से पशु चिकित्सालय में डॉक्टर नहीं है, जिसके चलते बीमार पशुओं का इलाज निजी डॉक्टरों से कराना पड़ता है।
किसान संजीव चौधरी का कहना है कि करीब पांच वर्षों से चिकित्सालय में डॉक्टर की नियुक्ति नहीं हुई, जिससे काफी परेशानी होती है।
समाजसेवी जगमेर शर्मा ने बताया कि कई बार उच्च अधिकारियों से गुहार लगाने के बावजूद स्थिति जस की तस बनी हुई है।
रिक्त पदों की सूचना शासन को भेजी जा चुकी है। संविदा नियुक्ति की प्रक्रिया जारी है तथा पशु मेलों, टीकाकरण शिविरों और मोबाइल वेटरिनरी यूनिट के माध्यम से सेवाएं दी जा रही हैं। - डॉ. चंद्रभानु कश्यप, मुख्य पशु चिकित्सा अधिकारी