{"_id":"6973ce70bc66004d9f04bad4","slug":"followers-worship-the-bodhi-tree-shravasti-news-c-104-1-slko1011-117479-2026-01-24","type":"story","status":"publish","title_hn":"Shravasti News: अनुयायियों ने बोधि वृक्ष की पूजा की","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Shravasti News: अनुयायियों ने बोधि वृक्ष की पूजा की
संवाद न्यूज एजेंसी, श्रावस्ती
Updated Sat, 24 Jan 2026 01:09 AM IST
विज्ञापन
तपोस्थली पर बोधि वृक्ष का पूजन-अर्चन करते थाईलैंड के अनुयायी। -संवाद
विज्ञापन
कटरा। बौद्ध तपोस्थली श्रावस्ती शुक्रवार को थाईलैंड से आए अनुयायियों के 50 सदस्यीय दल से गुलजार रही। सभी ने बौद्ध भिक्षु देवानंद के नेतृत्व में बोधि वृक्ष की पूजा-अर्चना की। इस दौरान बौद्ध सभा का भी आयोजन हुआ।
बौद्ध सभा को संबोधित करते हुए भिक्षु देवानंद ने कहा कि सम्प्रज्ञान और प्रज्ञा के माध्यम से परमार्थ धर्म को तभी स्पष्ट रूप से समझा जा सकता है, जब हम शीलों में स्थित होकर साधना अभ्यास में लीन रहें। मनुष्य वर्तमान जीवन में सुख-शांति और मृत्यु के उपरांत सद्गति चाहता है, उसे समय रहते शील, श्रुति, सत्पुरुष संवास और भावना की व्यवस्था प्राथमिकता से कर लेनी चाहिए।
उन्होंने आगे बताया कि काया, वाणी और मन से किए जाने वाले बुरे कर्मों से उत्पन्न संकटों को समझना चाहिए। बुरे कर्मों का दृढ़ निश्चय और संकल्प से परित्याग करना ही शीलों का पालन है। दैनिक अभ्यास से जब शील परिपक्व होकर चेतनागत हो जाते हैं, तो साधक शीलों में स्थित हो जाता है। केवल शील ही बुद्ध की शरण में प्रतिष्ठित होने का एकमात्र उपाय है। शीलों के पालन के बिना बुद्ध के वचनों को समझना असंभव है।
Trending Videos
बौद्ध सभा को संबोधित करते हुए भिक्षु देवानंद ने कहा कि सम्प्रज्ञान और प्रज्ञा के माध्यम से परमार्थ धर्म को तभी स्पष्ट रूप से समझा जा सकता है, जब हम शीलों में स्थित होकर साधना अभ्यास में लीन रहें। मनुष्य वर्तमान जीवन में सुख-शांति और मृत्यु के उपरांत सद्गति चाहता है, उसे समय रहते शील, श्रुति, सत्पुरुष संवास और भावना की व्यवस्था प्राथमिकता से कर लेनी चाहिए।
विज्ञापन
विज्ञापन
उन्होंने आगे बताया कि काया, वाणी और मन से किए जाने वाले बुरे कर्मों से उत्पन्न संकटों को समझना चाहिए। बुरे कर्मों का दृढ़ निश्चय और संकल्प से परित्याग करना ही शीलों का पालन है। दैनिक अभ्यास से जब शील परिपक्व होकर चेतनागत हो जाते हैं, तो साधक शीलों में स्थित हो जाता है। केवल शील ही बुद्ध की शरण में प्रतिष्ठित होने का एकमात्र उपाय है। शीलों के पालन के बिना बुद्ध के वचनों को समझना असंभव है।
