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नव संवत्सर 2083 का आगाज: 13 महीनों का होगा साल, बृहस्पति राजा
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सिद्धार्थनगर। चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के साथ हिंदू नववर्ष विक्रम संवत 2083 की शुरुआत हो रही है। पंचांग के अनुसार, इस वर्ष का नाम रौद्र संवत्सर है। धार्मिक मान्यता है कि इसी दिन सृष्टि की रचना आरंभ हुई थी। इस बार का नव संवत्सर कई मायनों में खास माना जा रहा है, क्योंकि अधिक मास पड़ने के कारण पूरे वर्ष में 12 की जगह 13 महीने होंगे। वहीं ग्रहों की स्थिति के अनुसार बृहस्पति को वर्ष का राजा और मंगल को मंत्री माना गया है।
ज्योतिषीय गणना के अनुसार, इस वर्ष बृहस्पति को राजा और मंगल को मंत्री माना गया है। पारंपरिक मान्यता है कि जब बृहस्पति वर्ष के राजा होते हैं तो धर्म, ज्ञान और सामाजिक संतुलन को बढ़ावा मिलता है। वहीं मंगल के मंत्री होने से ऊर्जा, साहस और सक्रियता का प्रभाव देखा जाता है।
ज्योतिषाचार्य पवन त्रिपाठी के अनुसार, हिंदू पंचांग में 60 संवत्सरों का चक्र चलता है और हर वर्ष का अलग नाम और प्रभाव बताया जाता है। इस बार शुरू होने वाला वर्ष रौद्र संवत्सर कहलाएगा। परंपरागत मान्यता के अनुसार यह संवत्सर ऊर्जा, सक्रियता और परिवर्तन का संकेत देने वाला माना जाता है।
ज्योतिषाचार्य सतीश मणि त्रिपाठी के अनुसार, इस वर्ष की सबसे बड़ी विशेषता अधिक मास का होना है। चंद्र और सूर्य की गणना में अंतर को संतुलित करने के लिए लगभग ढाई से तीन वर्ष में एक बार अधिक मास जोड़ा जाता है। इसके कारण इस वर्ष पंचांग में सामान्य 12 महीनों के बजाय 13 महीने होंगे। धार्मिक दृष्टि से अधिक मास को भगवान विष्णु की आराधना, दान-पुण्य और आध्यात्मिक साधना के लिए विशेष फलदायी माना जाता है। जिले के कई मंदिरों और धार्मिक संगठनों की ओर से भी नव संवत्सर के स्वागत की तैयारी शुरू हो गई है। श्रद्धालु इस दिन पूजा-पाठ, पंचांग पूजन और धार्मिक अनुष्ठानों के साथ नए वर्ष का स्वागत करेंगे।
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नव संवत्सर 2083 एक नजर में
- शुरुआत : चैत्र शुक्ल प्रतिपदा (19 मार्च)
- संवत्सर का नाम : रौद्र संवत्सर
- वर्ष का राजा : बृहस्पति
- मंत्री : मंगल
- अधिक मास के कारण 13 महीने
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इसलिए खास है यह दिन
- इसी दिन से हिंदू नववर्ष की शुरुआत
- मान्यता है कि ब्रह्मा ने इसी दिन सृष्टि की रचना की
- नवरात्र भी इसी दिन से शुरू
- पूरे वर्ष के पर्वों का क्रम इसी दिन तय होता है
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इस दिन की प्रमुख परंपराएं
- घरों में पूजा और कलश स्थापना
- पंचांग पूजन,नए कार्य या व्यापार की शुरुआत
- मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना
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इसलिए वैज्ञानिक माना जाता है हिंदू पंचांग
- सूर्य और चंद्रमा दोनों की गति पर आधारित गणना
- हर तीन वर्ष में अधिक मास से समय का संतुलन
- ऋतु और पर्वों का क्रम लगभग स्थिर रहता है
- हजारों वर्षों से प्रयोग में आ रहा कैलेंडर
(ज्योतिषाचार्य पवन त्रिपाठी के अनुसार)
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ज्योतिषीय गणना के अनुसार, इस वर्ष बृहस्पति को राजा और मंगल को मंत्री माना गया है। पारंपरिक मान्यता है कि जब बृहस्पति वर्ष के राजा होते हैं तो धर्म, ज्ञान और सामाजिक संतुलन को बढ़ावा मिलता है। वहीं मंगल के मंत्री होने से ऊर्जा, साहस और सक्रियता का प्रभाव देखा जाता है।
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ज्योतिषाचार्य पवन त्रिपाठी के अनुसार, हिंदू पंचांग में 60 संवत्सरों का चक्र चलता है और हर वर्ष का अलग नाम और प्रभाव बताया जाता है। इस बार शुरू होने वाला वर्ष रौद्र संवत्सर कहलाएगा। परंपरागत मान्यता के अनुसार यह संवत्सर ऊर्जा, सक्रियता और परिवर्तन का संकेत देने वाला माना जाता है।
ज्योतिषाचार्य सतीश मणि त्रिपाठी के अनुसार, इस वर्ष की सबसे बड़ी विशेषता अधिक मास का होना है। चंद्र और सूर्य की गणना में अंतर को संतुलित करने के लिए लगभग ढाई से तीन वर्ष में एक बार अधिक मास जोड़ा जाता है। इसके कारण इस वर्ष पंचांग में सामान्य 12 महीनों के बजाय 13 महीने होंगे। धार्मिक दृष्टि से अधिक मास को भगवान विष्णु की आराधना, दान-पुण्य और आध्यात्मिक साधना के लिए विशेष फलदायी माना जाता है। जिले के कई मंदिरों और धार्मिक संगठनों की ओर से भी नव संवत्सर के स्वागत की तैयारी शुरू हो गई है। श्रद्धालु इस दिन पूजा-पाठ, पंचांग पूजन और धार्मिक अनुष्ठानों के साथ नए वर्ष का स्वागत करेंगे।
नव संवत्सर 2083 एक नजर में
- शुरुआत : चैत्र शुक्ल प्रतिपदा (19 मार्च)
- संवत्सर का नाम : रौद्र संवत्सर
- वर्ष का राजा : बृहस्पति
- मंत्री : मंगल
- अधिक मास के कारण 13 महीने
इसलिए खास है यह दिन
- इसी दिन से हिंदू नववर्ष की शुरुआत
- मान्यता है कि ब्रह्मा ने इसी दिन सृष्टि की रचना की
- नवरात्र भी इसी दिन से शुरू
- पूरे वर्ष के पर्वों का क्रम इसी दिन तय होता है
इस दिन की प्रमुख परंपराएं
- घरों में पूजा और कलश स्थापना
- पंचांग पूजन,नए कार्य या व्यापार की शुरुआत
- मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना
इसलिए वैज्ञानिक माना जाता है हिंदू पंचांग
- सूर्य और चंद्रमा दोनों की गति पर आधारित गणना
- हर तीन वर्ष में अधिक मास से समय का संतुलन
- ऋतु और पर्वों का क्रम लगभग स्थिर रहता है
- हजारों वर्षों से प्रयोग में आ रहा कैलेंडर
(ज्योतिषाचार्य पवन त्रिपाठी के अनुसार)