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Siddharthnagar News: संसाधन न प्रशिक्षण...निहत्था वन विभाग पकड़ेगा बंदर

संवाद न्यूज एजेंसी, सिद्धार्थनगर Updated Mon, 19 Jan 2026 11:19 PM IST
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Siddharthnagar News: No resources, no training...unarmed forest department will catch monkeys
बढ़नी कस्बे में झुंड में बैठे बंदर। संवाद
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सिद्धार्थनगर। लोगों के दिन का चैन और रात का सुकून छीनने वाले आतंक का पर्याय बने बंदरों को पकड़ने और नियंत्रित करने की जिम्मेदारी औपचारिक रूप से वन विभाग को सौंप दी गई है। मगर विभाग खुद को निहत्था महसूस कर रहा है। उनके पास न तो प्रशिक्षित कर्मी हैं और न ही बंदरों को पकड़ने के लिए जरूरी कोई संसाधन ही उपलब्ध है। पिछले कुछ महीनों में सिद्धार्थनगर में बंदरों के हमलों के मामले सामने आए हैं। लोग घायल हुए हैं। डर के साए में कई इलाकों के लोग अब भी लोग छतों पर जाने से घबरा रहे हैं। ऐसे में सवाल यह है कि आखिर कब तक बंदरों को पकड़ने के लिए विभाग सक्षम होगा, जिससे लोगों का यह खौफ कम हो सके।
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बंदर की हरकतों से सबसे अधिक प्रभावित क्षेत्र जिले में डुमरियागंज नगर पंचायत विशेषकर बढ़नी चाफा, घोसियारी गांव के आसपास का इलाका है, जहां बंदरों के आतंक से लोगों को लगातार चोटें आ रही हैं। दुकानदारों पर हमले भी हुए हैं। स्थानीय निवासियों ने बताया है कि यहां से गुजरने वाले राहगीरों को निशाना बनाया जाता रहा है और कई व्यक्तियों को भी घायल किया जा चुका है।
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जमीनी हकीकत यह है कि जिले में वन विभाग के पास बंदरों को काबू करने का कोई उपकरण नहीं है। न तो ट्रैंकुलाइजर गन उपलब्ध है और न ही प्रशिक्षित प्राइमेट कैचर टीम ही है। यहां तक कि सेफ्टी नेट और पिंजरे भी विभाग के पास उपलब्ध नहीं हैं। ऐसा कोई इमरजेंसी रिस्पॉन्स सिस्टम भी नहीं है, जिससे किसी खूंखार लंगूर के हमलावर होने या घायल करने पर कार्रवाई की जा सके। विभागीय कर्मी बताते हैं कि बिना उपकरण और प्रशिक्षण के बंदरों को पकड़ना मुश्किल और खतरनाक है।
वन्य जीव प्रेमी बृजेश श्रीवास्तव बताते हैं कि जब तक ठोस योजना, पर्याप्त संसाधन और वैज्ञानिक दृष्टिकोण नहीं अपनाया जाएगा, तब तक बंदरों का यह संकट आम लोगों के लिए डर और असुरक्षा बना रहेगा।
प्रयागराज मॉडल एक उदाहरण: विभाग के जानकार बंदरों को नियंत्रित करने के लिए प्रयागराज मॉडल की चर्चा कर रहे हैं। वहां, विशेष मंकी कैचर टीमें बनाई गई है, कर्मियों को प्रशिक्षित किया गया है। वहीं बंदरों के लिए प्राकृतिक पुनर्वास क्षेत्र बनाए गए हैं। प्रशासन और विशेषज्ञों के बीच समन्वय स्थापित किया गया है। विशेषज्ञ मानते हैं कि सिद्धार्थनगर के लिए भी यही मॉडल अपनाया जा सकता है।
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