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जानलेवा है ये बीमारी: पांच साल तक के 20 बच्चों की आंख में कैंसर, 40 फीसदी की आंख निकालनी पड़ी

अभिषेक सेठ, संवाद न्यूज एजेंसी, वाराणसी। Published by: Pragati Chand Updated Thu, 09 Apr 2026 12:15 PM IST
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सार

Varanasi News: आंख में कैंसर की बीमारी एक महीने से पांच साल तक के बच्चों में हो रही है। एक महीने में ऐसे 20 मामले सामने आए हैं। कैंसर होने के बाद अंधेरे में बिल्ली की आंख की तरह उनकी आंखें चमकती हैं। 

Eye Cancer in 20 Children Under Age of Five Diagnosed at BHU Eyes Had to Be Removed in 40 Percent of Cases
बच्चों की आंख में कैंसर - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार

एक महीने से पांच साल तक के 20 बच्चों की आंख में कैंसर हो गया। बच्चों का इलाज बीएचयू के क्षेत्रीय नेत्र संस्थान में चल रहा है। 40 फीसदी बच्चों की कैंसर संक्रमित आंख निकालनी पड़ी है। 60 फीसदी की कीमोथेरेपी कराई जा रही है। जिन बच्चों को कैंसर हुआ है उनकी आंखें बिल्ली की तरह चमकती हैं। ज्यादातर बच्चे पूर्वांचल के अलग-अलग जिलों और बिहार से आए हैं। इन सबको रेटिनोब्लास्टोमा नामक जानलेवा आंख का कैंसर हुआ है। मार्च में ही तीन बच्चे इलाज कराने पहुंचे हैं। बाकी मामले 6 महीने के दौरान आए। 

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बीएचयू के क्षेत्रीय नेत्र संस्थान के विभागाध्यक्ष प्रो. डॉ. आरपी मौर्य ने बताया कि इन बच्चों में कैंसर की गांठें आंखों के भीतर तेजी से फैली हैं। कुछ मामलों में तो कैंसर ऑप्टिक नर्व के जरिये मस्तिष्क तक पहुंचने वाला था। बच्चों के आंखों की कीमोथेरेपी कराई गई। साथ ही माइक्रो सर्जरी के जरिये ट्यूमर निकाला गया। 
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सर्जरी के दौरान सबसे बड़ी चुनौती छोटे बच्चों को एनेस्थीसिया देने और नाजुक नसों को बचाने में आई। जिन बच्चों की आंख निकाली गई है उन्हें पत्थर की आंख लगाई गई है। अगर शुरुआती दौर में इलाज हो जाए, तो इसे सर्जरी से खत्म किया जा सकता है। 

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क्या है रेटिनोब्लास्टोमा

प्रो. मौर्य के मुताबिक, रेटिनोब्लास्टोमा मुख्य रूप से छोटे बच्चों में होने वाला दुर्लभ प्रकार का नेत्र कैंसर है। जब आंख के पिछले हिस्से यानी रेटिना की कोशिकाएं अनियंत्रित रूप से बढ़ने लगती हैं तब इस प्रकार की बीमारी विकसित होती है। 40 प्रतिशत मामलों में यह बीमारी परिवार के जींस के कारण होती है। यदि माता-पिता में से किसी को भी कभी कैंसर हुआ हो, तो यह बच्चे को भी प्रभावित कर सकता है।  

केस- 1
भभुआ (बिहार) के 8 माह के बच्चे की दाहिनी आंख की पुतली हल्की रोशनी में बिल्ली की तरह चमकती थी। फोटो खींचते समय फ्लैश गन की वजह से आंख में लाल घेरे के बजाय सफेद धब्बा दिखाई देने लगा। बीएचयू में जांच के दौरान पता चला कि बच्चे की आंख में कैंसर है। ट्यूमर शुरुआती चरण (स्टेज-बी) में था। कीमो-रिडक्शन तकनीक का इस्तेमाल किया गया। इससे ट्यूमर सिकुड़ गया। इसके बाद लेजर थेरेपी दी गई। बच्चे की आंख की रोशनी और जान बच गई।

केस- 2
गाजीपुर की 3 वर्षीय बच्ची तिरछा देख रही थी। माता-पिता ने इसे साधारण समझकर नजरअंदाज किया। धीरे-धीरे आंख में सूजन और लालपन बढ़ने लगा और बच्ची को उस आंख से कम दिखाई देने लगा। बीएचयू में जांच में सामने आया कि ट्यूमर बड़ा हो चुका था और ऑप्टिक नर्व (दृष्टि तंत्रिका) तक पहुंचने वाला था। संक्रमण को मस्तिष्क तक फैलने से रोकने के लिए डॉक्टरों को सर्जरी करनी पड़ी। बच्ची की जान बचा ली गई लेकिन आंख निकालनी पड़ी।

केस- 3
वाराणसी के पिंडरा निवासी 14 माह के बच्चे की दोनों आंखों में असामान्य चमक और पुतलियों का फैलाव देखा गया। बच्चा खिलौनों पर फोकस नहीं कर पा रहा था। जांच में पता चला कि यह बाइलेटरल रेटिनोब्लास्टोमा है। दोनों आंखों में कैंसर। यह जेनेटिक म्यूटेशन के कारण हुआ था। बीएचयू के विशेषज्ञों ने सर्जरी और विशेष कीमोथेरेपी से एक आंख की रोशनी को बचा लिया। दूसरी आंख की रोशनी कम हो गई है।

जानलेवा है ये कैंसर

डॉ. आरपी मौर्य ने बताया कि जब रेटिना की कोशिकाएं परिपक्व होने के बजाय असामान्य रूप से विभाजित होने लगती हैं, तो वे ट्यूमर (गांठ) का रूप ले लेती हैं। ट्यूमर आंख के भीतर ही बढ़ता रहता है। यदि इलाज न मिले, तो यह ऑप्टिक नर्व (दृष्टि तंत्रिका) के रास्ते मस्तिष्क तक पहुंच सकता है। यह शरीर के अन्य हिस्सों, जैसे हड्डियों या लिम्फ नोड्स, तक भी फैल सकता है जो जानलेवा साबित होता है।

ये हैं लक्षण

  • कम रोशनी में या कैमरे की फ्लैशलाइट पड़ने पर बच्चे की पुतली काली दिखने के बजाय सफेद, चांदी जैसी या सुनहरी चमके।
  • बच्चे की दोनों आंखों का एक दिशा में न होना। यदि बच्चा तिरछा देख रहा है, तो यह ट्यूमर के कारण दृष्टि में रुकावट के संकेत हो सकते हैं।
  • बिना किसी स्पष्ट संक्रमण या चोट के आंख का लंबे समय तक लाल रहना।
  • ट्यूमर के बढ़ने के कारण आंख का बाहर की ओर उभरना या उसमें लगातार सूजन रहना।
  • आंख की पुतली के रंग में अचानक बदलाव आना।
  • बच्चे का खिलौनों या वस्तुओं पर फोकस न कर पाना, चलते समय चीजों से टकराना या बार-बार आंखें मलना।
  • रोशनी पड़ने पर भी पुतली का सामान्य रूप से न सिकुड़ना।
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