ज्ञानवापी: आजादी के 11 साल पहले शुरू हुई कानूनी लड़ाई, 6 साल में खारिज; 55 साल बाद हिंदू पक्ष भी कोर्ट पहुंचा
Varanasi News: ज्ञानवापी विवाद में आजादी से 11 वर्ष पहले शुरू हुई कानूनी लड़ाई छह साल में खारिज हो गई थी। इसके 55 वर्ष बाद हिंदू पक्ष ने फिर अदालत का रुख किया। अब मामले में 21, 22 और 23 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट में विशेष लोक अदालत के दौरान सुनवाई प्रस्तावित है।
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Gyanvapi Case: ज्ञानवापी परिसर का विवाद आजादी से करीब 11 साल पहले 1936 में अदालत पहुंचा था। मुस्लिम पक्ष ने सड़क पर नमाज पढ़ने और परिसर के मालिकाना हक की मांग की थी लेकिन वाराणसी की निचली अदालत ने संबंधित भूमि को मस्जिद की संपत्ति मानने से इन्कार कर दिया था। साथ ही याचिका खारिज कर दी थी। यह मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट पहुंचा था। हाईकोर्ट ने भी अपील खारिज कर दी थी।
1991 से हिंदू पक्ष ने कानूनी लड़ाई शुरू की और मूलवाद दाखिल किया। यानी हिंदू पक्ष ने 55 साल बाद कानूनी लड़ाई शुरू की थी। ज्ञानवापी परिसर से जुड़ा पहला आधिकारिक मुकदमा दीन मोहम्मद बनाम सेक्रेटरी ऑफ स्टेट के नाम से दायर किया गया था।
दीन मोहम्मद समेत तीन लोगों ने अदालत में याचिका दाखिल कर ज्ञानवापी परिसर के समीप सड़क पर नमाज पढ़ने की अनुमति मांगी थी। यह भी कहा था कि परिसर का मालिकाना हक दिया जाए। आजादी के बाद ज्ञानवापी विवाद को नया मोड़ वर्ष 1991 में मिला।
वाराणसी की अदालत में स्वयंभू ज्योतिर्लिंग भगवान विश्वेश्वर की ओर से मूलवाद दायर किया गया। इसमें संपूर्ण ज्ञानवापी परिसर पर हिंदू पक्ष के अधिकार का दावा करते हुए तीन प्रमुख मांगें रखी गईं। पहला, संपूर्ण ज्ञानवापी भूमि पर हिंदू पक्ष का अधिकार घोषित किया जाए। दूसरा, अंजुमन इंतेजामिया मसाजिद कमेटी को परिसर से हटाया जाए और तीसरा, विवादित ढांचे को हटाकर प्राचीन मंदिर का पुनरुद्धार कराया जाए।
22 वर्षों तक रुकी रही सुनवाई : वर्ष 1998 में मुस्लिम पक्ष ने निचली अदालत की कार्रवाई को इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी। इसके बाद निचली अदालत में इस मुकदमे की सुनवाई पर करीब 22 वर्षों तक रोक लगी रही। बाद के वर्षों में न्यायिक प्रक्रिया दोबारा शुरू हुई और इसके बाद सर्वेक्षण, आयोग की कार्रवाई और अन्य याचिकाओं के जरिये मामला लगातार आगे बढ़ता रहा।
2022 और 2023 में मुकदमों की बाढ़, 36 नए मामले दर्ज : साल 2022 और 2023 में ज्ञानवापी का मुद्दा एक बार फिर देश की सुर्खियों में आ गया। इस अवधि के दौरान वाराणसी की निचली अदालतों से सुप्रीम कोर्ट तक मुकदमों की बाढ़ आ गई। कोर्ट से मिले आंकड़ों के अनुसार, ज्ञानवापी से संबंधित लगभग 36 नए मामले अलग-अलग अदालतों में दर्ज किए गए। इनमें मुख्य रूप से मां शृंगार गौरी की नियमित पूजा के अधिकार की मांग और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) से पूरे परिसर के वैज्ञानिक सर्वे की मांग शामिल थी।
ज्ञानवापी मामले में मध्यस्थता विफल होने के बाद गेंद पूरी तरह से सुप्रीम कोर्ट के पाले में चली गई है। अब सुप्रीम कोर्ट को ही तय करना है कि ज्ञानवापी मामले में 21, 22 और 23 अगस्त को विशेष लोक अदालत लगेगी या फिर नहीं। - राजेश मिश्र, स्पेशल काउंसिल फॉर स्टेट ज्ञानवापी
अब तक क्या क्या हुआ
- जून 1997 : वाराणसी की सिविल अदालत में हिंदू पक्ष की याचिकाओं पर सुनवाई शुरू हुई।
- 17 जुलाई 1997 : वाराणसी की सिविल अदालत ने मुकदमा खारिज कर दिया कि यह पूजा स्थल अधिनियम 1991 के तहत विचारणीय नहीं है। मंदिर और मस्जिद दोनों पक्षों ने जिला अदालत में कई पुनरीक्षण याचिकाएं दायर कीं।
- 28 सितंबर 1998 : न्यायाधीश ने याचिकाओं को एक साथ कर दिया और दीवानी न्यायालय को साक्ष्यों पर विचार करने के बाद निपटारा करने का आदेश दिया।
- 13 अक्तूबर 1998 : एआईएमआईएम और यूपी सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड की स्वामित्व संबंधी मुकदमों की वैधता को चुनौती देने वाली याचिका पर उच्च न्यायालय ने जिला न्यायालय के आदेश और कार्रवाई पर रोक लगा दी। रोक 22 वर्षों तक रही।
- दिसंबर 2019 : अयोध्या भूमि अधिकार विवाद पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के एक महीने बाद विजय शंकर रस्तोगी ने वाराणसी की सिविल अदालत में एक नई याचिका दायर की। पहला मौका था जब परिसर के वैज्ञानिक सर्वेक्षण की मांग की गई थी।
- फरवरी 2020 : मूल मुकदमे के वादियों ने अक्तूबर 1998 में उच्च न्यायालय द्वारा स्थगित किए गए मामले को फिर से खोलने के लिए वाराणसी सिविल न्यायालय में पुनः याचिका दायर की। उन्होंने 2018 के सर्वोच्च न्यायालय के एक आदेश का हवाला दिया
- 15 मार्च, 2020 : एआईएमआईएम की याचिका पर उच्च न्यायालय ने पहले वाराणसी सिविल कोर्ट के मामले को दोबारा खोलने के आदेश पर रोक लगा दी।